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पृथक तेलंगाना पर यह दोहरी राजनीति क्यों

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी देश में तीन राज्यों का गठन हुआ था, उस दौरान तो इस तरह के हालात पैदा नहीं हुए थे।

पृथक तेलंगाना पर यह दोहरी राजनीति क्यों
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केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार है और आंध्र प्रदेश में भी कांग्रेस की ही सरकार काम कर रही है, इसके बावजूद भी तेलंगाना के गठन में इतनी मुश्किल क्यों आ रही है? तेलंगाना गठन का विराध कर रहे सांसदों के हंगामे के कारण शुक्रवार को लगातार तीसरे दिन संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। यही नहीं संसद के पिछले तीन सत्र तेलंगाना विरोध की भेंट चढ़ गए। विरोध करने वाले सांसद खुद सत्ताधारी दल के ही हैं। यहां तक की उन्होंने इस मुद्दे पर अपने ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तक लाया है। जबकि संविधान के अनुच्छेद तीन में यह स्पष्ट किया गया हैकि नये राज्य के गठन या उसके नक्शे में बदलाव संबंधी सारी शक्ति केंद्र सरकार या लोकसभ के पास होगी। इसमें राज्य का कोई दखल नहीं है।
संघ की सरकार विधानसभा की राय मानने को भी बाध्य नहीं है। ऐसे में केंद्र सरकार लाचारगी का प्रदर्शन क्यों कर रही है? एक तरफ उसी की राज्य सरकार आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक-2013, जिसके तहत तेलंगाना गठन होना है, को खारिज करती है और करीब नौ हजार संशोधन का प्रस्ताव देती है। वहीं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी अपने ही सरकार के फैसले का पहले राज्य में चुनौती देते हैं और अब संसद सत्र के दौरान दिल्ली के जंतर मंतर पर घरने पर बैठे हैं। यह हास्यास्पद है। आखिर क्यों कांग्रेस ही कांग्रेस के फैसले का विरोध कर रही है? इससे सरकार की नीयत पर शक पैदा होता है, कहीं इस तरह के हथकंडे से वह अपना कोई हित तो नहीं साध रही है। यह समूचा परिदृश्य दिखाता है कि कांग्रेस पृथक तेलंगाना के मुद्दे पर दोहरी राजनीति कर रही है।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी देश में तीन राज्यों का गठन हुआ था, उस दौरान तो इस तरह के हालात पैदा नहीं हुए थे। केंद्र सरकार क्यों अपनी कमजोर इच्छाशक्ति का परिचय दे रही है, जबकि विपक्ष इस मुद्द पर सरकार को पूरा सहयोग देने का वादा कर चुका है। वह वाकई पृथक राज्य के प्रति गंभीर है और यदि मुख्यमंत्री तथा सांसद इसमें सच में बाधा साबित हो रहे हैं तो यह प्रश्न उठता है कि कांग्रेस उन्हें क्यों नहीं पार्टी से निष्कासित करने का साहस दिखा रहा है।
मौजूदा समय में कांग्रेस की सीमांध्र में स्थिति खराब है और तेलंगाना क्षेत्र में वह मजबूत है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि पार्टी अपने ही मुख्यमंत्री को खड़ा कर तेलंगाना गठन के बाद सीमांध्र में होने वाले नुकसान की भरपायी करना चाहती है। तेलंगाना की मांग बहुत पुरानी है। आंध्र प्रदेश के गठन के समय से ही इसकी मांग जोर पकड़ती रही है। अब तक इसके लिए हुए आंदोलनों में सौकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और करोड़ों की संपत्ति की क्षति हुई है। गत वर्ष जुलाई में कांग्रेस कार्य समिति ने तेलंगाना को देश का 29वां बनाने की मंजूरी दी थी। तब एक उम्मीद जगी थी पृथक तेलंगाना की दशकों पुरानी मांग पूरी हो जाएगी। अब जब यह अंतिम चरण में है तब भी इससे राजनीतिक हित साधने की कोशिश हो रही है। यह ठीक नहीं है। अब इसके गठन में देरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि राज्य में काम काज ठप पड़ा है।
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