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अब हांगकांग में लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन

हांगकांग की जनता इन दिनों सड़कों पर है। वे चीन पर झूठा होने और लोकतंत्र हड़पने का आरोप लगा रहे हैं।

अब हांगकांग में लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन

हांगकांग की जनता इन दिनों सड़कों पर है। वे चीन पर झूठा होने और लोकतंत्र हड़पने का आरोप लगा रहे हैं। दिन प्रतिदिन उग्र हो रहा उनका यह आंदोलन बीजिंग की सत्ता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। साल 1997 में हांगकांग पर चीन ने नियंत्रण कायम कर लिया था। उसके पहले वह ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा था। दरअसल, बीते कुछ दिनों में हांगकांग को लेकर चीनी सरकार के कुछ निर्णयों ने इस आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की है। इसमें से एक है, वर्ष 2012 में हांगकांग में इतिहास का नया पाठ्यक्रम पढ़ाने के लिए चीन की ओर से दिया गया निर्देश। चीन ने इसे राष्ट्रवादी इतिहास बताया था, जिसे उसकी मर्जी के मुताबिक काट-छांट के साथ तैयार किया गया था। तभी से हांगकांग के स्कूलों में इस पर काफी रोष व्याप्त है।

वहीं एक दूसरे फैसले के तहत चीनी सरकार ने पिछले महीने हांगकांग के नेता के लिए साल 2017 में होने वाले चुनाव में उम्मीदवारों के खुले चयन पर रोक लगा दी। पहले सभी उम्मीदवारों का नामांकन खुला रहता था, लेकिन चीन ने चालाकी दिखाते हुए यह व्यवस्था खत्म कर दी और अब नेता पद के लिए नामांकन भी गोपनीय रहेंगे। इसी बात को लेकर आंदोलनकारियों को विरोध है। हांगकांग की राजनीति में चीन का किसी भी रूप में वे दखल नहीं चाहते हैं। उनकी मांग है कि हांगकांग में साल 2017 में होने वाले नेतृत्व परिवर्तन पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए। चुनाव में नामांकन की प्रक्रिया खुली होनी चाहिए। अर्थात इसमें किसी के भी भाग लेने की छूट होनी चाहिए।

इस प्रकार प्रदर्शनकारी हांगकांग में होने वाले चुनावों में पूर्ण लोकतांत्रिक अधिकार चाहते हैं। जबकि चीन सीमित अधिकार देने के पक्ष में है। अब लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारी और चीनी प्रशासन अपने-अपने रुख पर आड़े हैं। इस टकराव का सार्थक हल निकालने के लिए वार्ता की कोशिश भी नाकाम रही है। रविवार को हिंसा कि भी खबरें मिलीं। इससे पहले प्रदर्शनकारियों पर पुलिस आंसू गैस के गोले और रबर की गोलियां चला चुकी है, परंतु उससे लोकतंत्र समर्थकों के हौसले में कोई कमी नहीं आई है। यह गतिरोध अब और बढ़ने की संभावना है,क्योंकि प्रदर्शन की वजह से सरकारी दफ्तर और स्कूल तो बंद हैं ही वहां की आर्थिक गतिविधियां भी ठप पड़ी हैं। जिसे बहाल करने के लिए चीनी प्रशासन सख्ती दिखा सकता है।

चीन का यह कदम उस समझौते के विपरीत है जिसके तहत हांगकांग का उसमें विलय हुआ था। विलय समझौते केतहत हांगकांग में स्वतंत्र शासन प्रणाली के सिद्धांत पर काम करने की बात हुई थी। इस प्रकार चीन का उसकी शासन प्रणाली में कोई हस्तक्षेप नहीं होना था, परंतु बाद में उसने आर्थिक रूप से संपन्न हांगकांग के कामकाज में दखलअंदाजी करना शुरू कर दिया। इससे वहां के लोगों में घोर उत्तेजना उत्पन्न हुई है। चीन के इस रुख पर हांगकांग की जनता, विशेषकर छात्रों को विशेष आपत्ति है, इसलिए पिछले कुछ दिनों से वहां आंदोलन छिड़ गया है, जो लगातार उग्र होता जा रहा है। बेहतर यही होगा कि चीनी प्रशासन लोकतंत्र समर्थकों पर बल प्रयोग करने की बजाय उनसे वार्ता कर मुद्दे के सार्थक हल की ओर आगे बढ़े।

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