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लोकपाल चयन समिति पर कठघरे में सरकार

देश को एक मजबूत, ईमानदार और निष्पक्ष लोकपाल मिले यह सबकी अपेक्षा है।

लोकपाल चयन समिति पर कठघरे में सरकार
नई दिल्ली. देश में लोकपाल के गठन की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। देश को एक मजबूत, ईमानदार और निष्पक्ष लोकपाल मिले यह सबकी अपेक्षा है। यह तभी संभव हैजब इसके चयन में शामिल सभी सदस्य बिना किसी लागलपेट और मतभेद के एक मत होकर अपनी भूमिका निभाएंगे, परंतु जिस तरह से लोकपाल के चयन के लिए सर्च कमेटी गठित करने वाली समिति के पांचवें सदस्य को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है वह उचित नहीं है।
हालांकि इसके लिए कहीं ज्यादा जिम्मेदार सत्तापक्ष दिखती है। कानून के अनुसार इस सर्च कमेटी के सुझाए नामों में से ही किसी एक को लोकपाल बनाने का फैसला यह समिति करेगी। यहां विवाद चयन समिति के पांचवें सदस्य के तौर पर वरिष्ठ वकील पीपी राव को लेकर हुआ है। चयन समिति की सदस्य और लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इनके नाम पर आपत्ति जताई है। हालांकि उनके सर्मथन नहीं देने के बाद भी एक के मुकाबले तीन मतों से राव का चयन समिति के पांचवें सदस्य के तौर पर हुआ है और प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति को सिफारिश भी कर दी है।
समिति में शामिल तीन अन्य सदस्यों प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और जस्टिस एचएल दत्तू ने राव के पक्ष में वोट दिया। दत्तू चीफ जस्टिस पी सदाशिवम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने आरोप लगाया हैकि कांग्रेस अपने पसंद के लोगों को इसमें शामिल करना चाहती है, क्योंकि राव कांग्रेसी विचारधारा से प्रभावित हैं। उन्हें कांग्रेस का वफादार माना जाता है। यहां प्रश्न उठता हैकि सत्ता पक्ष उनके नाम पर ही क्यों अड़ा है, जबकि अन्य कई अच्छे नाम विकल्प के रूप में मौजूद हैं और विपक्ष भी उन पर सहमत है। वैसे भी प्रधानमंत्री सोमवार को हुई बैठक में कुल सात कानूनविदों के नाम लेकर आए थे। इससे कांग्रेस की मंशा पर सवाल खड़ा होता है।
सत्ता पक्ष संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्ति को लेकर अपनी मनमानी करता रहा है। इससे पूर्व सीवीसी के रूप में पीजे थॉमस की नियुक्ति के समय भी इसी तरह नेता प्रतिपक्ष के विरोध को नजरअंदाज किया गया था। बाद में भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे थॉमस को सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद हटाया गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति से जुड़े या खास पार्टी की विचारधारा से प्रभावित लोगों को इस समिति में नहीं होना चाहिए। वैसे भी किसी भी संस्था की मजबूती उसकी अगुआई करने वाले शख्स पर निर्भर करती है। यदि पद पर बैठा व्यक्ति ईमानदार और निष्पक्ष होगा तो ही उसकी गरिमा बनी रहेगी वरना उसकी महत्ता प्रभावित होगी।
संवैधानिक पदों पर निष्पक्ष व्यक्ति को बैठाना चाहिए क्योंकि इससे देशहित जुड़ा होता है। करीब पांच दशक की मांग के बाद देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को खत्म करने के लिए लोकपाल का गठन किया जा रहा है। कोई पार्टी यदि इस मंशा के साथ संवैधानिक संस्थाओं में अपने लोगों को बैठाए कि वह संकट के समय उनके हितों की रक्षा करेगा तो यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक नहीं है। ऐसे पदों पर निष्पक्ष और ईमानदार लोग बैठें और सत्ता व विपक्ष के प्रति झुकाव नहीं रखते हुए फैसले करें तो ही ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब रह जाता है।
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