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पुराने वादे हैं अधूरे नए सपने दिखाए

यूपीए के दस वर्ष के शासनकाल में देश को महंगाई, भ्रष्टाचार और लचर अर्थव्यवस्था मिली है।

पुराने वादे हैं अधूरे नए सपने दिखाए
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लोकसभा चुनावों के लिए बुधवार को जारी कांग्रेस के घोषणापत्र को मतदाताओं को लुभाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। इसे तैयार करने में कांग्रेस को पांच महीने लगे हैं। साथ ही समाज के विभिन्न वगरें के करीब दस हजार लोगों से रायशुमारी के बाद इसे तैयार किया गया है। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में लोगों को राइट टू हेल्थ, राइट टू होम और राइट टू पेंशन काअधिकार देने की बात की है। वहीं यह भी कहा है कि पार्टी सत्ता में आने के बाद दस करोड़ युवाओं को रोजगार देगी और देश के 80 करोड़ आबादी को मध्यवर्ग में लाएगी। इसके लिए सौदिनों का एजेंडा भी पेश किया है। जाहिर है, ऐसे ही कुछ वादे और अधिकार यूपीए-एक और यूपीए-दो के घोषणापत्र में भी थे पर उन अधिकारों का हर्श क्या हुआ है, देख सकते हैं।
यूपीए के दस वर्ष के शासनकाल में देश को महंगाई, भ्रष्टाचार और लचर अर्थव्यवस्था मिली है। हां, सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी कह सकती है कि उसने भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और लोकपाल जैसे महत्वपूर्ण कानून दिए, परंतु यहां सवाल उठता है कि सरकार ने ये सब कार्यकाल के अंतिम दिनों में आनन-फानन में क्यों पारित कराए। वह भी जब देश चुनावी मोड़ पर पहुंच गया था। नौ साल तक उसे अपने वादे याद क्यों नहीं आए। जाहिर है, चुनाव नजदीक आते देख यह मतदाताओं को भरमाने और लुभाने का एक प्रयास था।
यह भला कौन भूल सकता है कि 1971 में इंदिरा गांधी ने भी गरीबी हटाओं का नारा दिया था और उसी के बिना पर उनकी वापसी हुई थी। देश को आजाद हुए 67 साल हो गए और इसमें से करीब पचास वर्ष देश पर गांधी परिवार का शासन रहा है। फिर भी देश की बड़ी आबादी गरीबी और अभावों में गुजर कर रही है। उनके पास न तो शिक्षा है, न भोजन है, न स्वास्थ्य है और न ही रोजगार है। यहां प्रश्न खड़ा होता है कि इतने वर्षों तक सत्ता में रह कर उसने क्या हासिल किया। 2009 में डॉ. मनमोहन सिंह ने यूपीए के आने के सौ दिन के अंदर महंगाई पर काबू पाने का भरोसा दियाथा परंतु आज हालात देख सकते हैं। आम आदमी महंगाई की मार से त्रस्त है। भ्रष्टाचार चरम पर है। विकास दर एक दशक के निचले स्तर पर पहुंच गई है। अब जनता ऐसी लुभावनी बातों में आने वाली नहीं है।
राजनीतिक पार्टियों को भी समझना होगा कि मतदाताओं से लंबे-चौड़े वादे करना आसान है परंतु उन्हें क्रियान्वित करना और जमीन पर उतारना मुश्किल होता है। बीते पांच वर्ष के यूपीए के दावे और हकीकत की राजनीति को देश देख चुका है। जिसकी एक तस्वीर ओपिनियन पोल दिखा रही है। यह सही है कि ओपिनियन पोल हमेशा ही सही तस्वीर पेश नहीं कर पाती है। जैसा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी कहा है कि इस बार सर्वे के आंकड़े गलत साबित हो जाएंगे, पर उन्हें यह भी याद रखना होगा कि राजनीति में एक ही बात बार-बार दोहराई जाए यह भी संभव नहीं है। वहीं राहुल गांधी भले ही कहें कि 2009 की तरह इस बार भी लोकसभा चुनावों के नतीजे चौंकाने वाले होंगे परंतु अब ऐसी बातें कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए काम आ सकती हैं। जाहिर है, मई में नतीजे आने के बाद यह पता चल जाएगा कि उनके घोषणापत्र में लोगों ने कितना भरोसा किया है।

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