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बजट सत्र में सार्थक कामकाज की उम्मीद

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में लगातार महंगाई बनी हुई है, इस बीच जरूरी वस्तुओं के दाम भी तेजी से बढ़े हैं।

बजट सत्र में सार्थक कामकाज की उम्मीद
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नई दिल्‍ली. सोमवार से सोलहवीं लोकसभा का पहला बजट सत्र आरंभ हो रहा है। करीब सवा महीने तक चलने वाले इस सत्र में 28 बैठकें होंगी। बजट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली राजग सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं का आभास हो जाएगा। अगले पांच साल तक के भारत की आर्थिक नीतियों की झलक भी इसमें दिख सकती है। आज अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर नई सरकार के सामने ढेरों चुनौतियां हैं। जिसे गति देने की जरूरत है, इसके लिए बजट में कुछ कड़े प्रावधान हो सकते हैं। वहीं तीन दशक बाद ऐसी स्थिति एक बार फिर उत्पन्न हुई है जब एक पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है और दूसरी ओर विपक्ष हाशिए पर है अर्थात संसदीय नियमों के अनुसार किसी भी दल को उतनी सीटें नहीं मिली हैं जिससे कि वह लोकसभा में मुख्य विपक्ष पार्टी का दर्जा पा सके।

ऐसे में यह भी देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार कैसे बिखरे हुए विरोधी दलों के साथ तालमेल बैठाती है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मंशा पहले ही साफ कर दी है कि वह सभी छोटे-बड़े दलों को साथ लेकर चलेंगे। वहीं कांग्रेस कुछ ज्यादा ही सख्त रवैया दिखा रही है। राजग सरकार को अभी सत्ता में आए महज एक महीने ही हुए हैं और वह महंगाई सहित कई मुद्दों पर उसे घेरने को तत्पर है जबकि यह उसी की देन मानी जाती रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में लगातार महंगाई बनी हुई है। इस बीच जरूरी वस्तुओं के दाम भी तेजी से बढ़े हैं, परंतु नई सरकार संवेदनशीलता दिखाते हुए कीमतों को काबू में करने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रही है। यह भी उतना ही सही हैकि केवल केंद्र सरकार के प्रयास से कुछ नहीं होगा, इसमें राज्य सरकारों को भी आगे आना होगा। उन्हें जमाखोरों और मुनाफाखोरों से सख्ती से निपटना होगा।

वहीं संसद का बार-बार बाधित होना भी एक बड़ी समस्या रही है। संसद सुचारु रूप से चले इसके लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बुलाई गईसर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों ने जो मुद्दे उठाए खासकर महंगाई, तेल की कीमत और रेल किराए में वृद्धि पर मोदी सरकार ने बहस कराने की बात स्वीकार कर अपनी मंशा जता दी है कि वह संसद को हंगामेदार बनाने की बजाय सार्थक बहस का मंच बनाना चाहती है। 15वीं लोकसभा का कटु अनुभव देश के सामने है। जब संसदीय इतिहास में सबसे कम विधायी कार्य हुए और उसके कामकाजी घंटे का बड़ा हिस्सा शोरगुल की भेट चढ़ गया।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार संसद का महत्वपूर्ण वक्त बर्बाद नहीं होगा। वैसे भी संसद विचार-विर्मश व चर्चा का मंच है, राजनीति करने का माध्यम नहीं। हालांकि जिस तरह कांग्रेस नेता विपक्ष के पद को लेकर उतावली दिख रही है वह भी ठीक नहीं है। कांग्रेस जानती हैकि संसदीय नियम और परंपराएं दोनों उसके पक्ष में नहीं हैं। कैसा संयोग है कि जब वह पूर्ण बहुमत में होती थी तब किसी को नेता विपक्ष नहीं बनने दिया।

लिहाजा लोकसभा तीस वर्षों तक बिना नेता विपक्ष के भी चला है। और इस समय वह इसे पाने को सभी उपाय कर रही है। कुछ विषयों के लिए नेता विपक्ष की जरूरत होती है, परंतु संसद चलाने के लिए इसकी कोई जरूरत नहीं है। लोकसभा अध्यक्ष ने बजट सत्र के बाद इस मुद्दे का सर्वमान्य हल खोजने की बात कही है, परंतु कांग्रेस अदालत जाने और राज्यसभा में सरकार को सहयोग नहीं देने की धमकी दे इसे बेवजह तूल दे रही हैजो कि उचित नहीं है।

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