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संपादकीय: अयोध्या मामले की सुनवाई का रोड़ा हटा

अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च अदालत ने अपने 1994 के फैसले को बरकरार रख कर इस मामले की सुनवाई की राह में पड़े रोड़े को हटा दिया है। अब अदालत सिर्फ मुख्य मामले ‘टाइटिल सूट'' पर अपना फैसला देगी।

संपादकीय: अयोध्या मामले की सुनवाई का रोड़ा हटा

अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च अदालत ने अपने 1994 के फैसले को बरकरार रख कर इस मामले की सुनवाई की राह में पड़े रोड़े को हटा दिया है। अब अदालत सिर्फ मुख्य मामले ‘टाइटिल सूट' पर अपना फैसला देगी। 1994 में इस्माइल फारूकी केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

दरअसल शीर्ष अदालत के पास याचिका दी गई थी वह अपने 1994 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए उसे बड़ी बेंच के पास भेजे, ताकि यह निर्णय हो सके कि ‘मस्जिद में नमाज इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं।‘ इस पर उच्चतम न्यायालय ने बड़ी बेंच में भेजने से इनकार करते हुए कहा कि इस पर निर्णय हो चुका है कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में हाल में यह मुद्दा उस वक्त उठा जब चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ अयोध्या मामले में 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि तीन गुंबदों में बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा का और बाकी एक तिहाई सुन्नी वक्फ बोर्ड का होगा।

इस फैसले को तमाम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति को बहाल कर दिया। अब जब 5 दिसंबर 2017 को अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई थी, तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला महज जमीन विवाद है,

लेकिन इसी दौरान मुस्लिम पक्षकार की ओर से दलील दी गई कि मस्जिद में नमाज पढ़ने का अधिकार है और यह इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने यह फैसला 2-1 के बहुमत से दिया है। इस बेंच के तीसरे जज जस्टिस एसए नजीर ने कहा कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, इस विषय पर फैसला धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए है।

वैसे जस्टिस नजीर खुद कानूनविद हैं तो वे जानते ही होंगे कि अदालत भावना या आस्था के आधार पर फैसला नहीं देती है, बल्कि तथ्यों व सबूतों के बिना पर देती है। अदालत ने कहा कि 1994 का फैसला जमीन अधिग्रहण के संदर्भ में था, नमाज के संदर्भ में नहीं। बेंच में शामिल जस्टिस भूषण ने कहा कि सभी मंदिर, मस्जिद और चर्च का अधिग्रहण किया जा सकता है,

राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे की गुंबद को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दीवानी मुकदमा भी चला। जिसमें टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में है। दोनों पक्ष अयोध्या के विवादित ढांचे पर अपना दावा पेश कर रहे हैं। 29 अक्टूबर से इस मामले पर नियमित सुनवाई होगी।

शीर्ष अदालत जो भी फैसला देगी, वह साक्ष्यों, तथ्यों व सबूतों के आलोक में होगा। इसे सबको मानना चाहिए। इस मसले को धार्मिक, राजनीतिक व भावनात्मक बनाने से किसी का भला नहीं होगा। सभी धार्मिक स्थलों का समान सम्मान होना चाहिए। भारत बहुधर्मी-बहुसांस्कृतिक होते हुए भी संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष देश है।

राजनीति के लिए धार्मिक भावना से खिलवाड़ आवाम में दरार पैदा करेगी, जिससे हमारी एकता कमजोर ही होगी। नमाज पर फैसला किसी की जीत या हार नहीं है। ऐसे ही स्वामित्व पर निर्णय भी न्याय की रक्षा होगा, जीत-हार नहीं। हमें अतीत से निकल कर आगे देखना चाहिए।

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