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इस शह मात के खेल में आम आदमी कहां है

सवाल यह है कि यह स्थिति क्यों पैदा हुई है, जिससे कि एक मुख्यमंत्री को धरना पर बैठना पड़ा।

इस शह मात के खेल में आम आदमी कहां है
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नई दिल्ली. यह सवाल उतना बड़ा नहीं है कि एक मुख्यमंत्री को धरने पर बैठना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह स्थिति क्यों पैदा हुई है, जिससे कि एक मुख्यमंत्री को धरना पर बैठना पड़ा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी मांगों को लेकर यदि सांकेतिक धरने पर बैठना चाह रहे थे तो क्यों रोका गया? उन क्षेत्रों में क्यों धारा-144 लगाई गई? जबकि वे एक निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। इस पूरे मामले को देखकर केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय की नीयत पर भी सवाल खड़ा होता है।
अरविंद दिल्ली पुलिस पर अपने दो मंत्रियों की बात नहीं मानने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि जब दिल्ली पुलिस प्रदेश के मंत्री की बात नहीं सुनती तो आम जनता की बात का कितना मान रखती होगी। यह ठीक है कि पुलिस की कार्य प्रणाली में कई खामियां हैं। जिनमें सुधार की सख्त दरकार है पर मुख्यमंत्री जो तरीका अपना रहे हैं वह कितना सही है? अब इस पर भी सवाल उठ सकते हैं और उठ भी रहे हैं? इससे अरविंद केजरीवाल पर भी शक हो रहा है।
कहीं यह आप की आगामी लोकसभा चुनावों के प्रति कोई रणनीति तो नहीं है? पूरी दिल्ली को जाम करके, ट्रैफिक को अव्यवस्थित करके वे जनता में क्या संदेश देना चाहते हैं? इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के हर नागरिक को अपनी मांगों को रखने और आवाज उठाने के लिए लोकतंत्र में अधिकार है और अहिंसक धरना-प्रदर्शन उसका एक कारगर तरीका रहा है। यदि उन्हें अपनी मांग को आवाज देनी थी तो तो उसके लिए दिल्ली में बकायदा स्थान निर्धारित है।
आप पार्टी अब सरकार में है पर अब भी वह खुद को आंदोलनकारी की तरह पेश कर रही है। यह सरकार चलाने का उसका अपना तरीका हो सकता है पर तमाम सुधार के कार्यक्रमों को लागू करवाने के लिए जरूरी नहीं कि नियमों कायदों की धज्जियां उड़ाई जाएं। उनको ध्यान रखना चाहिए कि इससे अराजकता फैल सकती है। ऐसा होता हैतो जो जनता उनको उम्मीद भरी नजरों से देख रही है वह नजरों से गिरा भी सकती है। उनकी मंशा पर भले ही कोई संदेह न हो परंतु उनके तरीके प्रश्नों के घेरे में हैं। आप पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता योगेंद्र यादव ने मुख्यमंत्री के कदम का बचाव करते हुए कहा है कि दरअसल, अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार के घोषणा पत्र के अनुसार काम कर रहे हैं। पार्टी की भी मांग है कि दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के अधीन होनी चाहिए।
अरविंद केजरीवाल इस धरने के जरिये जनता में यही संदेश देना चाहते हैं कि दिल्ली पुलिस बेलगाम हो गई है। वह राज्य सरकार के अधीन नहीं है। वह केंद्र सरकार के अधीन है और केंद्र सरकार अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पा रही है। लिहाजा उनकी मांग है कि दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन लाई जाए। जब तक पुलिस उनके तहत नहीं आएगी तब तक वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकते। हालांकि केंद्र सरकार को चुनी हुई सरकार की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। उसके मांगों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। क्योंकि कुछ भी होता है तो जनता चुनी हुई सरकार का ही मुंह देखती है। वहीं अरविंद केजरीवाल को भी ध्यान रखना चाहिए कि इसके लिए एक संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है।

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