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समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित

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समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित
भारतीय संस्कृति की गरिमामयी इतिहास और परंपरा को देखते हुए समलैंगिक संबंधों को अपराध की र्शेणी में रखने का सुप्रीम कोर्टका फैसला बिल्कुल सही है। शीर्षअदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलटा है, जिसमें चार वर्षपूर्व उसने समलैंगिक संबंधों को अपराध की र्शेणी से बाहर कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने तर्कदिया था कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-377 जीने की स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसके बाद भाजपा के बीपी सिंघल ने इस व्यवस्था को शीर्ष अदालत में चुनौती देते हुए कहा था कि इस तरह का कृत्य गैरकानूनी, अनैतिक और भारतीय संस्कृति के लोकाचार के खिलाफ है। इसके अलावा कई धार्मिक (हिंदू व मुस्लिम दोनों) और सामाजिक संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट से अपनी अपील में समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने का आग्रह किया था। सबकी उम्मीदों के अनुरूप बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने कहाकि समलैंगिक यौन संबंध बनाना अपराध है, क्योंकि हाईकोर्ट का फैसला संविधान के अनुरूप नहीं है। धारा-377 अप्राकृतिक यौन संबंध को गैर कानूनी ठहराता है। इस धारा के तहत किसी भी व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने पर या किसी जानवर के साथ यौन संबंध बनाने पर उम्र कैद या 10 साल की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर कोई मत न देकर संवैधानिक पहलुओं को देखते हुए ही हाईकोर्ट के फैसले को खारिज किया है। अदालत का कहना सही हैकि दिल्ली हाईकोर्ट आईपीसी की धारा को नहीं हटा सकता, बल्कि आईपीसी से धारा-377 हटाई जाए या नहीं यह देखने का काम विधायिका का है, वही इसके लिए अधिकृत है, लेकिन जब तक यह प्रावधान मौजूद है तब तक कोर्ट इस तरह के यौन संबंधों को वैध नहीं ठहरा सकता। अब संसद को समलैंगिकता के मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि देश में यह मुद्दा विवादास्पद बना हुआ। देश में ऐसा सोचने वालों की संख्या कम नहीं है जो मानते हैं कि जब दुनिया के कई देश ऐसे संबंधों को स्वीकार रहे हैं तो भारत क्यों नहीं? हालांकि देखा जाए तो केंद्र सरकार का भी इस पर रवैया ढुलमुल रहा है, परंतु भविष्य में विधायिका जब भी इस पर विचार करने के लिए बैठे तो उसे देश की संस्कृति को ध्यान में रखकर ही किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचना चाहिए। देश में कुछ तथाकथित प्रोग्रेसिव और आधुनिकता का लबादा ओढ़ने और उसके पक्ष में तर्क देने वालों की ओर से इसे कानूनी मान्यता देने की बातें की जाती रही हैं, लेकिन वे इस दरम्यान भारतीयता को भूल जाते हैं। ऐसी चीजें हमारी संस्कृति का कभी हिस्सा भी नहीं रही हैं। हमारी परंपरा, गौरवशाली इतिहास और संस्कृति तो इसकी इजाजत भी नहीं देती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में समलैंगिकों की आबादी 25 लाख होने का अनुमान है और इनमें से करीब सात प्रतिशत पौने दो लाख एचआईवी संक्रमित हैं। इस तरह देखा जाए तो स्वास्थ्य के लिहाज से भी ऐसे रिश्ते उचित नहीं है। इस तरह के संबंधों का हिमायत करने वाले किस तरह का समाज देना चाहते हैं वे ही जानें, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने बेहतर फैसला दिया और जनभावनाओं का सम्मान किया है।
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