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राष्ट्रपति शासन की ओर अग्रसर होती दिल्ली

चिंतन

राष्ट्रपति शासन की ओर अग्रसर होती दिल्ली
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मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से इतर दिल्ली विधानसभा में त्रिशंकु जनादेश के कारण वहां सरकार बनने की तस्वीर धुंधली नजर आ रही है। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के पास सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं है। वहीं दूसरी बड़ी आम आदमी पार्टी किसी का सर्मथन लेने और देने के लिए तैयार नहीं है। जिस तरह का माहौल बना है उसमें गतिरोध टूटने की संभावना लगभग नगण्य है। लिहाजा, दिल्ली दोबारा चुनाव की ओर अग्रसर दिखाई देती हुई प्रतीत हो रही है। हालांकि दिल्ली के उपराज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण देंगे, उसके इंकार के बाद ही वे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करेंगे। यदि राष्ट्रपति शासन लगता है तो छह माह के अंदर दिल्ली विधानसभा के चुनाव कराने होंगे। ऐसे में दिल्ली में विधानसभा के दोबारा चुनाव आगामी लोकसभा चुनावों के साथ या फिर उससे पूर्व भी कराये जा सकते हैं। कुल 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में बीजेपी और सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (बादल) की सीटों को मिलाकर आंकड़ा केवल 32 सीट तक पहुंच पाया है। जबकि सत्ता में आने के लिए कम से कम 36 सीटों की जरूरत है। भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार डॉ. हर्षवर्धन ने स्पष्ट कर दिया हैकि जनता ने हमें सरकार बनाने लायक जनादेश नहीं दिया है, जिससे वे सरकार बनाने की पहले नहीं कर सकते। वहीं दिल्ली में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिली हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी साफ कर दिया है कि त्रिशंकु विधानसभा के माहौल में वे जोड़-तोड़ की राजनीति में नहीं पड़ेंगे। वह विपक्ष में बैठकर रचनात्मक भूमिका निभाएंगे। जाहिर है बदले परिदृश्य में कोई भी पार्टी जोड़तोड़ व विधायकों की खरीद फरोख्त का खतरा नहीं उठाएगी। क्योंकि एक छोटा-सा लालच 2014 की संभावनाओं को पलीता लगा सकता है। कहां कमी रह गई है कि पूर्ण बहुमत नहीं मिली, इसका भारतीय जनता पार्टी भी मंथन कर रही होगी पर सबसे बड़ा आत्ममंथन का दौर कांग्रेस में शुरू हो गया है। जिस तरह से कांग्रेस का सूफड़ा साफ हुआ है उसमें पार्टी के अंदर बड़े बदलाव की जरूरत भी महसूस की जाने लगी है। हालांकि कांग्रेस चाहती है कि आम आदमी पार्टी उससे सहयोग मांगे, लेकिन आप के नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे बैसाखियों के सहारे सत्ता नहीं चलाएंगे, बल्कि विपक्ष में बैठेंगे और यही बात भाजपा ने भी कह दी है। जोड़तोड़ की राजनीति से अपने को दूर रखकर भाजपा ने एक तरह से राजनीतिक परिपक्वता का ही परिचय दिया है। वो ऐसा कोई संकेत, मतदाताओं, कांग्रेस और आप पार्टी को भी, नहीं देना चाहती जिससे किसी को कहने का मौका मिले की भाजपा कहती कुछ है और करती कुछ। ऐसी स्थिति में दिल्ली के उपराज्यपाल राज्य का शासन चलाएंगे। वैसी स्थिति में चुनावों में बुरी तरह हारी कांग्रेस केंद्र सरकार के बल पर उपराज्यपाल के जरिए वह सब कर सकती है, जिससे मतदाताओं को लुभा सकें। और ऐसे में दोबारा चुनाव होने पर पार्टियों के मौजूदा प्रदर्शन में अंतर आ जाए तो आश्चर्य नहीं।

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