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फिर उजागर हुआ सरकार की कथनी-करनी में फर्क

फहीम बेग उसी समस्या की ओर उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे देश सालों से जूझ रहा है।

फिर उजागर हुआ सरकार की कथनी-करनी में फर्क
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नई दिल्ली. दिल्ली के विज्ञान भवन में बुधवार को वक्फ बोर्ड के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बीच में ही रोककर डॉ. फहीम बेग उसी समस्या की ओर उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे देश सालों से जूझ रहा है। अर्थात सत्ता में आने के बाद सरकारें आनन-फानने में लोकलुभावन कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा तो कर देती हैं, लेकिन वे धरातल पर कितनी उतर पाईं, उतरीं भी या नहीं और लक्षित वर्ग को उसका कितना फायदा मिला इसे सुनिश्चित करने की जहमत नहीं उठाती हैं। हालांकि उन्हें अपनी बात रखने के दौरान जिस तरीके से रोका गया वह एक लोकतांत्रिक देश में शोभा नहीं देता। हम ऐसे देश में रह रहे हैं जहां एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार शासन कर रही है। और तो और, प्रधानमंत्री को उस शख्स से कोई खतरा भी नहीं था।
डॉ. बेग प्रधानमंत्री के मंच से बहुत दूर थे, वहीं से उन्होंने अपनी बात कहने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री जी आप मंच से जो बात कर रहे हैं वे धरातल पर नहीं उतरी हैं, लिहाजा आज किसी नई योजना की घोषणा न करें, परंतु उनको बोलने न देना और घसीटते हुए बाहर ले जाना दिखाता है कि सत्ता में बैठे लोग व तंत्र अपने विरोध में उठी आवाजों को सहन करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि खबरों में यह बात आई कि प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी उस शख्स से मिलकर उनकी बात सुनना चाहती हैं, लेकिन ये लोग तब आगे आए जब मीडिया में यह घटना तूल पकड़ी। डॉ. फहीम बेग का कहना है कि उन्होंने देश में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री को करीब 150 पत्र लिखे पर कोई जबाव नहीं मिला। उसके बाद उन्होंने आरटीआई से प्रधानमंत्री के 15 सूत्री कार्यक्रमों का पूरा ब्यौरा मांगा कि दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले में ये कार्यक्रम कहां-कहां चल रहे हैं। जवाब मेंयह बात सामने आई है कि सरकार ने जिन कार्यक्रमों की घोषणा कर रखी है उसमें से अभी तक कोई भी कार्यक्रम लागू नहीं हुआ है और सभी पाइपलाइन में हैं। यानी उनके लिए अभी बजट ही तय नहीं है।
यहां सवाल उठता हैकि तब क्यों सरकार उनका र्शेय लेकर वाहवाही लूटने की कोशिश करती रही है। इस संबंध में उस शख्स का यह सवाल वाजिब लगता हैकि पिछले दस वर्षों से सरकार क्या करती रही, क्यों कल्याणकारी योजनाएं अभी तक रुकी हैं। इस घटना से एक बात फिर साबित होती है कि लोकलुभावन घोषणाएं कर दी जाती हैं पर वे जमीन पर उतरी हैं कि नहीं यह जानने के लिए हमने अभी तक कोई तंत्र विकसित नहीं किया है। जब तक योजनाएं अमल में नहीं आएंगी, तब तक लोगों को उससे कोई लाभ मिलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। साढ़े नौ साल से डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं, जो सोनिया और राहुल गांधी की सलाह से सरकार चला रहे हैं। राहुल कहते फिर रहे हैं कि वे व्यवस्था परिवर्तन के सबसे बड़े पैरोकार हैं। वहीं इस घटना को देखें तो इतने वर्षों में ये लोग व्यवस्था परिवर्तन में तनिक भी सफल नहीं हो पाए हैं तो जनता क्यों विश्वास करे कि ये अब व्यवस्था को बदल देंगे। एक तरीके से इस घटना ने इनके अंतरविरोध और सरकार की कथनी-करनी में अंतर को फिर से उजागर किया है।
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