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फांसी से आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 1993 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में मौत की सजा पाए याकूब मेमन को फांसी होनी तय है।

फांसी से आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश
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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 1993 में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के मामले में मौत की सजा पाए याकूब मेमन को फांसी होनी तय है। उसने सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी किए गए डेथ वारंट की वैधता और सुधारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पिटिशन) की सुनवाई प्रक्रिया को चुनौती दी थी, जिसे शीर्ष अदालत ने बुधवार को खारिज कर दिया। अर्थात सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि डेथ वारंट सही था और सुधारात्मक याचिका की सुनवाईमें मानक प्रक्रियाओं का पालन किया गया। राज्यपाल और राष्ट्रपति की ओर से भी उसकी दया याचिका खारिज कर दी गई है। यह दुर्भाग्य है कि सैकड़ों लोगों की हत्या के दोषी की सजा को लेकर कुछ लोगों द्वारा राजनीतिक बयानबाजी की जा रही है। इसे एक खास धर्म से जोड़कर देखने की कोशिश की जा रही है, जो कि गलत है। उसकी फांसी को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग हो रही थी। कहा जा रहा था कि याकूब पिछले 23 वर्षों से जेल में बंद है लिहाजा उसे राहत दी जानी चाहिए। यहां देश में न्याय की लंबी प्रक्रिया पर बहस हो सकती है, परंतु यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई आधार देखा तभी उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा। भारतीय न्यायव्यवस्था की एक विशेषता है कि वह हर अभियुक्त को अपना हरसंभव बचाव करने का अवसर देती है।

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याकूब को भी बचाव करने के सभी मौके मिले, लेकिन कहीं से भी उसे राहत नहीं मिली, वह इसीलिए कि किसी भी स्तर पर साक्ष्य उसके पक्ष में नहीं देखे गए। मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने इस मामले में 2007 में याकूब सहित 12 लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने याकूब को छोड़कर शेष दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। अदालत ने याकूब की फांसी पर मुहर लगाते हुए कहा था कि वह साजिश में गहराई तक शामिल था। जाहिर है, उसकी भूमिका इस बम कांड में कहीं ज्यादा संगीन थी। यानी उसने दाऊद इब्राहिम और अपने बड़े भाई टाइगर मेमन के साथ मिलकर इस धमाके की साजिश रची थी। दाऊद और टाइगर अभी फरार हैं। वे पाकिस्तान में बैठकर भारत में आतंकी गतिविधियां चला रहे हैं, जबकि याकूब को घटना के एक साल बाद गिरफ्तार कर लिया गया था।

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12 मार्च, 1993 को नहीं भूला जा सकता है। उस दिन मुंबई के अलग-अलग तेरह जगहों पर श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए थे। उस विस्फोट में 257 लोगों की मौत हो गई थी और करीब सात सौ लोग घायल हो गए थे। करोड़ों की संपत्ति की हानि हुई थी। उस धमाके को देश में आतंकवाद का आरंभ बिंदु माना जाता है। आज इसने विकराल रूप धारण कर लिया है। सुप्रीम कोर्टने अपने एक फैसले में कहा है कि फांसी की सजा रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में ही दी जानी चाहिए। जाहिर है, शीर्ष अदालत ने याकूब की भूमिका को इस र्शेणी में पाया है। ऐसे में फांसी पर बहस करने की बजाय इसे स्वीकार करने की जरूरत है। इस तरह की आतंकी गतिविधियों को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। न ही मानवता के दुश्मनों के साथ किसी तरह की हमदर्दी बरती जानी चाहिए। कुलमिलाकर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देश के दुश्मनों के बीच कड़ा संदेश जरूर जाएगा।

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