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चिंतन: कहीं आबादी के बोझ से ध्वस्त न हो जाएं शहर

1991 के बाद भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है।

चिंतन: कहीं आबादी के बोझ से ध्वस्त न हो जाएं शहर
देश की राजधानी दिल्ली दुनिया की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन गया है। संयुक्त राष्टÑ (यूएन) का विश्व शहरीकरण परिदृश्य-2014 की समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में सिर्फ जापान की राजधानी टोक्यो की आबादी ही दिल्ली से अधिक है। 1990 के बाद से दिल्ली की आबादी दोगुनी हो गई है। अभी दिल्ली में 2.50 करोड़ लोग रह रहे हैं जबकि टोक्यो की आबादी 3.80 करोड़ है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक जनसंख्या का यही क्रम बना रहेगा परंतु जहां टोक्यो की आबादी में कमी देखी जाएगी, वहीं दिल्ली की आबादी में लगातार वृद्धि होगी। वहीं सबसे अधिक आबादी के मामले में मुंबई का स्थान विश्व में छठा है, लेकिन वर्ष 2030 तक चीन के शंघाई के बाद इसका स्थान चौथा हो जाएगा।
1991 के बाद भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। 2001 में जहां देश की कुल 27.8 फीसदी आबादी शहरों में रहती थी। वहीं 2011 में यह आंकड़ा बढ़कर 31 फीसदी हो गया। इन सबके बावजूद यह भी उतना ही सत्य है कि भारतीय शहरें हर तरह से बदहाल हैं। इसकी एक तस्वीर पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में सामने आई थी। जिसने दुनिया के 1600 शहरों के अध्ययन के आधार पर पाया था कि दिल्ली की हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। यही नहीं दूसरे कई मानकों पर भी हमारे शहर कहीं नहीं टिकते हैं। यहां जीवन-यापन के लिए जरूरी सुविधाओं का नितांत अभाव है। देश में विश्वस्तरीय शहरों की संख्या उंगली पर गिनी जा सकती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2014-15 के आम बजट में दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए कई मदों में फंड की व्यवस्था की है। वहीं पुराने शहरों से आबादी का बोझ कम करने के लिए सौ नए आधुनिक शहर बसाने की योजना शुरू करने का प्रस्ताव रखा है।
अब बजट में इसके उल्लेख से आने वाले दिनों में शहरीकरण को एक नई दिशा मिलने की उम्मीद बढ़ी है। ग्रामीण इलाकों से लोगों के लगातार होते पलायन को देखते हुए देश में नए शहरों की दरकार भी है। विशेषज्ञों का मत है कि देश की शहरी आबादी में बीते चार दशकों में जो वृद्धि हुई है, उससे कहीं ज्यादा अगले दो दशक में हो सकती है। यूएन की रिपोर्ट में भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक भारत अपनी शहरी जनसंख्या में 40.4 करोड़ लोगों को जोड़ेगा। ऐसे में हमारे सभी महानगरों की आबादी आॅस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से भी अधिक हो जाएगी। शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ता जा रहा है। जिस कारण शहरी व्यवस्था चरमरा-सी गई है। कहीं वे अपने वजन से ही ध्वस्त न हो जाएं, लिहाजा इनके आसपास नए शहर बसाना वक्त की मांग भी है। पिछले दो-तीन दशकों में देश में शहरीकरण की प्रक्रिया बेहद असंतुलित और दिशाहीन ढंग से आगे बढ़ी है।
शहरों को नियोजित रूप से बसाने और बढ़ाने का काम नहीं हुआ है। वे स्वयं बसते और बढ़ते गए हैं। हम ध्यान रखें कि शहर का अर्थ मात्र एक रहने का स्थान भर नहीं होता है। एक संपूर्ण शहर का मतलब है जहां लोगों को केवल एक छत ही नहीं बल्कि रोजगार, शिक्षा, सांस्कृतिक गतिविधि और मनोरंजन के साधन भी उपलब्ध हों। शहर में समाज के हर वर्ग अमीर-गरीब के लिए जगह होनी चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि संपन्न वर्ग को सभी सुविधा मिले और गरीब वर्ग हाशिए पर रहने को मजबूर हो जाए। वहीं शहरों में तेजी से बढ़ते अपराध और लोगों के बीच बढ़ती अजनबीयत भी चिंता की बात होनी चाहिए। आज जब सौ स्मार्ट शहरों की योजना साकार होने की ओर बढ़ रही है तब इनकी बनावट भी आदर्श शहर की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
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