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चिंतनः हंगामे की भेंट चढ़ता संसद का शीत सत्र

शीत सत्र में हंगामे से आहत होकर गत दिनों राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कार्यवाही चलाने के लिए थ्री डी फॉर्मूला याद दिलाया था।

चिंतनः हंगामे की भेंट चढ़ता संसद का शीत सत्र
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संसद का मौजूदा शीतकालीन सत्र भी मानसून सत्र की तरह बेवजह के हंगामे की भेंट चढ़ता हुआ दिख रहा है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल संसद को ठप करने के लिए हर रोज नए-नए बहाने गढ़ रहे हैं। इससे देश की सर्वोच्च पंचायत ज्वलंत मुद्दों पर न चर्चा कर पा रही है और ना ही जरूरी विधायी कायरें को निपटा पा रही है।
हालांकि सत्र के आरंभ में जिस तरह से दो दिनों तक संविधान दिवस के अवसर पर डॉ. भीमराव अंबेडकर का संविधान बनाने में योगदान विषय पर अच्छी बहस देखने को मिली थी उससे उम्मीद की जा रही थी कि सदन में टकराव के हालात नहीं पैदा होंगे, लेकिन यह आशा जल्द ही निराशा में तब्दील हो गई।
आरंभ में नेशनल हेराल्ड मामले को मुद्दा बना कर कांग्रेस के सांसदों ने कई दिनों तक संसद को बंधक बनाए रखा, लेकिन जब अदालती आदेश के खिलाफ संसद में हंगामा करने के लिए पार्टी की चौतरफा आलोचना होने लगी तो वह सीबीआई के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाने लगी। भ्रष्टाचार के आरोपों पर केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाईको देश के संघीय ढांचे पर चोट बता कर संसद को पंगु बनाया गया।
अब असम के राज्यपाल के आचरण को असंवैधानिक बता रही है और राज्यसभा नहीं चलने दे रही है। वहीं गत दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने शिकायत की कि उन्हें असम के बारपेटा के एक मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया। साथ ही केरल में प्रधानमंत्री के एक कार्यक्रम में वहां के मुख्यमंत्री को नहीं बुलाए जाने को भी अपमान से जोड़कर संसद नहीं चलने दिया गया, लेकिन कांग्रेस की ओर से संसद में उठाए गए ये दोनों मुद्दे भी बाद में खोखले साबित हुए।
दरअसल, कांग्रेस ने तय कर लिया है कि संसद को किसी न किसी तरह बाधित किए रखना है, ऐसे में वह हर छोटी बड़ी घटना को तूल दे रही है और सदन के काम काज को रोक रही है। इसमें उसे दूसरे विपक्षी दलों का भी साथ मिल रहा है। कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि संसद में शोरगुल करने से देश की जनता के बीच उसके खिलाफ नकारात्मक संदेश जा रहा है। इस तरह वह अपनी जगहंसाई तो करा ही रही है देश के विकास के रास्ते में भी रोड़ा अटका रही है। लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं कि एक दल अपनी हठधर्मिता के कारण संसद को असहाय कर दे।
शीत सत्र में हंगामे से आहत होकर गत दिनों राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कार्यवाही चलाने के लिए थ्री डी फॉर्मूला याद दिलाया था। उन्होंने कहा संसद की कार्यवाही तीन डी-डिबेट (बहस), डिसेंट (मतभेद) व डिसीजन (निर्णय) के तहत चलनी चाहिए। लोकतंत्र में कभी चौथा डी डिसरप्शन (व्यवधान) नहीं होना चाहिएा। व्यवधान उत्पन्न करने के लिए कई अन्य स्थान भी हैं। अब जब संसद का शीत सत्र खत्म होने में कुछ ही दिन बचे हैं तब कांग्रेस सहित विपक्ष को उनकी इस नसीहत पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ताकि वस्तु एवं सेवाकर सहित लंबित पड़े अन्य जरूरी विधेयक जल्द से जल्द पारित हो सकें व देशहित में जरूरी फैसले लिए जा सकें।
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