Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

चिंतन: वर्षाजल संरक्षण के साथ ''जल प्रबंधन'' भी जरूरी

पीएम ने कहा कि पानी का एक बूंद भी बर्बाद हो, तो हमें पीड़ा होनी चाहिए।

चिंतन: वर्षाजल संरक्षण के साथ

अधिकांश हिस्से में सूखे के संकट का सामने कर रहे देश के लोगों को मॉनसून से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानी बचाने का संदेश देकर 'वर्षाजल संरक्षण' जैसे बड़े मुद्दे की ओर लोगों का ध्यान खींचा है। दरअसल, भारत ही नहीं पूरी दुनिया गंभीर जल संकट के दौर से गुजर रहा है। आज भी बड़ी आबादी की पहुंच सुलभ पेयजल तक नहीं है। महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्य भयानक सूखे की चपेट में हैं। महाराष्ट्र के लातूर में तो पानी आपूर्ति के लिए सरकार को ट्रेन भेजनी पड़ी थी। प्रधानमंत्री देश में पानी की समस्या के प्रति संवेदनशील हैं, इसलिए ही उन्होंने कहा कि पानी बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारों व नेताओं की ही नहीं, बल्कि यह जन-सामान्य की भी है।

पीएम ने कहा कि पानी का एक बूंद भी बर्बाद हो, तो हमें पीड़ा होनी चाहिए। वे 'स्वच्छ भारत' की तरह ही 'जल संरक्षण' को भी एक जन-अभियान बनाना चाहते हैं। इसलिए मानसून से पहले के अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में पानी बचाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि हमें आने वाले चार महीने में वर्षाजल के बूंद-बूंद को संरक्षित करने की चेष्टा करनी चाहिए। दरअसल, भारत में वर्षाजल संरक्षण के प्रति पर्याप्त जागरूकता नहीं है, जबकि विश्व के दूसरे देश इस क्षेत्र में बहुत आगे है। ऐसे ही भारत ने कम जल की खपत वाला फसलचक्र भी अभी तक नहीं अपनाया है।

पीएम ने इस ओर भी इशारा किया कि हमें ऐसी फसल की खेती करनी चाहिए, जिसमें कम पानी लगता हो। इस मामले में मिस्र और चीन बहुत आगे है। मिस्र ने तो सत्तर के दशक में ही अपने फसलचक्र को बदल लिया था, चीन एक दशक से सजग हुआ है। मिस्र में तो नील जैसी नदी का जलभंडार है। चीन में भी काफी बड़ी-बड़ी नदियां हैं। ये दोनों देश अपने जल भंडार को बचाने के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर 'वाटर इंपोर्ट मैनेजमेंट' को अपना रहे हैं। इसमें अधिक पानी से उपजने वाले चावल, गेहूं जैसे अनाज आयात करते हैं और कम पानी वाली फसल निर्यात करते हैं।

एक किलो चावल तैयार करने में औसतन 300 लीटर पानी लगता है। इसलिए अगर कोई देश एक किलो चावल आयात करता है तो इसका मतलब वह इनडायरेक्ट 300 लीटर पानी भी आयात करता और उतने ही अपना पानी बचाता है। इस बार गंभीर सूखे के बाद पर्यावरणविदों और कृषि विशेषज्ञों ने भारत को देश के अन्दर इसी तरह का फसल चक्र अपनाने की सलाह दी है। इसमें देश के जिस हिस्से में पानी की उपलब्धता ज्यादा है, वहां धान, गेहूं, गन्ने आदि की खेती हो, जबकि कम पानी वाले क्षेत्र में सब्जी, मोटे अनाज, दलहन, तिलहन की खेती हो।

इस तरह के आइडिये पर आखिर में नीति तो सरकार को ही बनानी है। जल संरक्षण के प्रति प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता अच्छी बात है और सूखे से निपटने जैसे मुद्दों पर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा से बात भी कर रहे हैं, लेकिन केवल इसी से बात नहीं बनेगी। हमें समग्रता में जल प्रबंधन के लिए कृषि, सिंचाई व पर्यावरण के समावेश के साथ राष्ट्रीय जलनीति जल्द बनानी होगी, जिसमें वनसंरक्षण पर भी फोकस हो और उस नीति को अमल में भी लाना होगा।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलोकरें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

Next Story
Top