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चिंतनः इरा के जज्बे से युवाओं को सीखने की जरूरत

इरा सोलिऑसिस नामक बीमारी से ग्रस्त हैं।

चिंतनः इरा के जज्बे से युवाओं को सीखने की जरूरत
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कौन कहता है कि आसमां में सूराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। ये पंक्तियां दिल्ली की शारीरिक रूप से निशक्त इरा सिंघल पर सटीक बैठती हैं। इरा ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में देश भर में टॉप किया है। उन्होंने यह सफलता छठी कोशिश में हासिल की है।
शारीरिक रूप से निशक्त इरा सिंघल मजबूत इरादों और ठोस आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति बनकर उभरी हैं। आईएएस बनने की चाह में उनकी निशक्तता आड़े नहीं आई। उनकी हिम्मत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि यूपीएससी की परीक्षा एक बार नहीं, बल्कि पहले भी चार बार पास कर चुकी हैं। शुरुआत में परीक्षा में सफल होने के बाद भी उन्हें मेडिकल तौर पर अयोग्य बताकर बाहर बैठा दिया गया था, लेकिन उन्होंने अपने हक की लड़ाई के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां से उन्हें न्याय मिला।
दरअसल, वह सोलिऑसिस नामक बीमारी से ग्रस्त हैं। इसमें इंसान की रीढ़ की हड्डी सामान्य तौर पर कमर या सीने के पास से दाईं या बाईं तरफ मुड़ जाती है। कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग करने वाली इरा एफएमएस से एमबीए की पढ़ाई की हैं। वर्तमान में वे भारतीय राजस्व सेवा की अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। वहींआईएएस की परीक्षा में यह पहली बार हुआ हैकि शीर्ष चार स्थान पर देश की बेटियों ने कब्जा जमाया है। इससे साफ होता है कि लड़कियां किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं हैं, बस उन्हें अवसर देने की जरूरत है। इससे पहले ट्रेन हादसे में एक पैर गवां चुकी अरुणिमा सिन्हा ने कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर) फतह कर इतिहास रच दिया था। वे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली विकलांग महिला हैं। इनके बुलंद हौसलों के आगे हिमालय को भी झुकना पड़ा था।
आज देश में जहां हिंसा और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इन सबके बीच से समाज में जब व्यक्तित्व उभरते हैं तो वे पूरे देश को प्रकाश पूंज की तरह रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं। कभी कोई अरुणिमा सिन्हा तो कभी कोई इरा सिंघल आइकॉन बनकर उभरते हैं तो ऐसे लोगों के जज्बे से पूरे समाज को प्रेरणा मिलती है या मिलनी चाहिए। ये संघर्ष की बदौलत अपनी जिंदगी की रेस जीतते हैं पर अफसोस की बात यह है कि आज लोगों को इनसे प्रेरणा मिलती दिखाई नहीं देती।
आज हमारे बीच ऐसे कई आइकॉन हैं, लेकिन समाज में हो रहे नैतिक पतन और जिंदगी की दौड़ में एक दूसरे से आगे निकलने की आपाधापी में ज्यादातर लोग इनकी अनदेखी कर रहे हैं। आज निराशा की गर्त में पहुंचे ऐसे युवाओं को जो थोड़ी-सी असफलता मिलने से भयभीत हो जीवन का अंत कर लेते हैं, और जिंदगी की सच्चाई को नजरअंदाज कर गलत रास्ते पर निकल आते हैं, उन्हें इरा जैसे आईकॉन से सीखने की जरूरत है।
उन्होंने दिख दिया है कि कैसे हिम्मत, जज्बा और संघर्ष के आगे जिंदगी की सारी कठिनाइयां बौनी हो जाती हैं। अब निश्चित रूप से देश निशक्त लोगों को अलग तरह से देखेगा। इससे भी बढ़कर देश की इन बेटियों की सफलता देखकर उम्मीद की जानी चाहिए कि समाज लड़कियों से भेदभाव नहीं करेगा और उन्हें बेहतर नजरिए से देखेगा।
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