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सबको त्वरित और सस्ता न्याय मिलना जरूरी

अंसल बंधुओं सुशील और गोपाल अंसल को सुप्रीम कोर्ट ने बतौर सजा 60 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया है।

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अठारह साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद राजधानी दिल्ली के बहुचर्चित उपहार सिनेमा अग्निकांड में लापरवाही बरतने के दोषी अंसल बंधुओं सुशील और गोपाल अंसल को सुप्रीम कोर्ट ने बतौर सजा 60 करोड़ रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया है। यानी जुर्माना भरने के बाद उन्हें जेल नहीं जाना पड़ेगा। कोर्ट के इस फैसले पर पीड़ित परिवारों ने असंतोष जताया है। मालूम हो कि 1997 में दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में लोग बॉर्डर फिल्म देख रहे थे। उसी दौरान आग लग गई, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी और सौ से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। निचली अदालत ने अंसल बंधुओं को इस घटना का दोषी मानते हुए दो साल की सजा दी थी। बाद में हाईकोर्ट ने दोनों की सजा को घटाकर एक साल कर दिया था। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्टमें चुनौती दी गई, जहां गत वर्ष मार्च में दो जजों की पीठ ने अंसल बंधुओं की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा था, लेकिन सजा को लेकर दोनों की राय अलग-अलग थी। उसके बाद सजा का मुद्दा तय करने के लिए इस केस को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के पास भेजा गया था, जिसने बुधवार को सजा के मुद्दे पर फैसला सुनाते हुए अंसल बंधुओं की अब तक जेल की काटी गई करीब पांच महीने की सजा को पर्याप्त मानकर तीस-तीस करोड़ का जुर्माना भरने का आदेश दिया।

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इन दिनों देश में ऐसी धारणा बनती जा रही है कि अमीर और गरीब के लिए कानून एक जैसा नहीं है। यानी देश में जो पैसे वाला है वह जेल जाने से बच जाएगा और जिसके पास पैसा नहीं है, वही जेल जाएगा। पिछले दिनों हिट एंड रन केस में सलमान खान को जमानत मिलने पर भी इसी तरह के संदेश जाने की बात कही गई थी। उनको दोपहर में निचली अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई, लेकिन शाम को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। उन्होंने पैसे के बल पर वकीलों की फौज खड़ी कर ली और वकीलों ने कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर सलमान खान को जेल जाने से बचा लिया। गत दिनों विधि आयोग की मदद से नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने 2000 से लेकर 2015 के दौरान देश में विभिन्न अदालतों द्वारा दी गई फांसी की सजा का अध्ययन करने के बाद कहा था कि देश में गरीबों व पिछड़ों को अमीर लोगों के मुकाबले कड़ी सजा मिलने की दर अधिक है क्योंकि उन्हें समय पर कानूनी सहायता नहीं मिलती है।

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देश में कितने निर्दोष अकारण जेल में बंद पड़े हैं, इसका कोई हिसाब नहीं है। अनेक लोग इसलिए बंद हैं कि कोई उनकी जमानत लेने वाला कोई नहीं है। दूसरी ओर विभिन्न मामलों में सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। बलात्कार के तो 25 फीसदी मामलों में ही सजा हो पाती है। अदालतें मुकदमों के बोझ तले दबी हुई हैं। विभिन्न अदालतों में तीन करोड़ से अधिक केस लंबित हैं। वहीं एक एक मामले की सुनवाई में बीस से पच्चीस वर्ष का समय लग रहा है। समय पर न्याय मिलना भी जरूरी है। कहते हैंकि देरी से न्याय भी एक तरह का अन्याय ही है। इन सब कारणों से आज आम आदमी में कानून व न्याय के प्रति विश्वास कम हो रहा है। न्याय व्यवस्था में आई इन समस्याओं को दूर करने की जरूरत है।

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