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संवैधानिक संस्थाओं का अपमान अलोकतांत्रिक

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने तो इसे लोकतंत्र का काला अध्याय तक कह दिया।

संवैधानिक संस्थाओं का अपमान अलोकतांत्रिक
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राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के दौरान सियासी दलों को संवैधानिक संस्थाओं को अपमानित करने से बचना चाहिए। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता कि विपक्षी पार्टी खासकर कांग्रेस सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को निशाने पर ले रही है।

जबकि उन्होंने कांग्रेस के जिन 25 सांसदों को लोकसभा से पांच दिनों के लिए निलंबित किया है, वे न सिर्फ सदन के कामकाज में व्यवधान पैदा कर रहे थे, बल्कि संसद की र्मयादा को भी तार-तार कर रहे थे। वे निलंबित सांसदों को कई दिनों से हिदायत दे रही थीं कि एनडीए सरकार के विरोध का उनका तरीका, सदन के अंदर, लोकसभा के नियमों के प्रतिकूल है। इसके बावजूद वे सभी उनकी बातों को नजरअंदाज करते हुए सदन के अंदर प्लेकार्ड लहराते रहे और काली पट्टी बांध कर हंगामा करते रहे।

यही वजह है कि उन्हें लोकसभा संचालन के नियम 374 (ए) के तहत निलंबन का कठोर फैसला करना पड़ा। लोकसभा अध्यक्ष का पद संवैधानिक पद है जो कि किसी भी तरह की सियासत से ऊपर होता है। लोकसभा को कैसे फलदायी बनाया जाए इसकी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती है। इसके लिए उन्हें लोकसभा को शांतिपूर्वक व सुचारू रूप से चलाने जैसे महत्वपूर्ण कर्त्तव्य का निर्वहन करना पड़ता है।

जिससे संसद में बैठे सभी सांसदों को अपनी बात कहने और सत्ता पक्ष से जवाब मांगने का मौका मिले तथा जनहित में अधिक से अधिक विधायी कार्य हो सकें। इसी मकसद को पूरा करने के लिए उन्होंने संसद की र्मयादा को भंग करने वाले सांसदों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने की ईमानदार कोशिश की है, लेकिन विडंबना है कि विपक्षी दल इस सजा से कुछ सीखते नहीं दिख रहे हैं। कहां तो उन्हें अपने किए पर शर्मिंदा होना चाहिए, लेकिन उल्टे वे लोकसभा अध्यक्ष पर ही आरोप मढ़ रहे हैं कि वे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश कर रही हैं।

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने तो इसे लोकतंत्र का काला अध्याय तक कह दिया। जबकि पूरा देश देख रहा है कि दोनों सदनों में, चाहे वह लोकसभा हो या राज्य सभा, कांग्रेस स्वयं ललित मोदी की कथित मदद हो या व्यापमं घोटाले के मुद्दे पर चर्चा करने से भाग रही है। इसके अलावा सांसदों के निलंबन के मुद्दे को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के आवास के बाहर प्रदर्शन कर देश में एक और गंदी परिपाटी की शुरुआत की है।

इस दौरान उनकी ओर से बहुत ही ओछी नारेबाजी भी की गई। ऐसा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। कांग्रेस के नेता अपने सांसदों के निलंबन का एक हद तक ही विरोध करें, जैसे कि वे संसद परिसर में धरना देखकर कर भी रहे हैं, लेकिन यह उचित नहीं है कि वे उन पर केंद्र सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाएं और उनके खिलाफ नारेबाजी करें। ऐसा कर वे भारतीय लोकतंत्र का ही मजाक उड़ा रहे हैं।

उनके इस आचरण से लोकतंत्र की जड़ें कमजोर ही होंगी। संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाओं की अनदेखी करने के मामले में कांग्रेस का रिकॉर्ड पहले से ही खराब रहा है, लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मोदी सरकार के अंध विरोध में वह नकारात्मक सियासत की सारी हंदे लांघने पर तुली हुई है।

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