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क्या दुनिया सुन रही है शांति के मसीहाओं को

मलाला आतंकियों के खिलाफ खड़े होकर लड़कियों की शिक्षा के लिए बुलंद आवाज बन गई हैं।

क्या दुनिया सुन रही है शांति के मसीहाओं को

बुधवार को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में नोबेल पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान जिसने भी भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई का संबोधन सुना होगा वह नोबेल समिति के प्रमुख थोर्बजोर्न जगलांद के इस कथन से शतप्रतिशत सहमत होगा कि ये दोनों निश्चित तौर पर वही हैं जिन्हें अलफ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में शांति का मसीहा कहा था। गत महीने कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चयन किया गया था।

कैलाश सत्यार्थी ने अपने प्रयासों से अब तक 80 हजार से अधिक बच्चों को अनिश्चितता के भंवर से निकालकर स्कूलों तक पहुंचाया है। वहीं मलाला आतंकियों के खिलाफ खड़े होकर लड़कियों की शिक्षा के लिए बुलंद आवाज बन गई हैं। दोनों ने अपने संबोधनों से दुनिया को अभिभूत तो किया ही साथ ही बच्चों के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। इसमें कोईदो राय नहीं कि आज यदि विश्व जगत इनकी बातों पर अमल करे तो हरेक बच्चे का न केवल भविष्य महफूज हो जाएगा बल्कि वे खुलकर हंसने, रोने, स्कूल जाने और सबसे बड़ी बात सपने देखने के लिए आजाद हो जाएंगे।

कैलाश सत्यार्थी ने बिल्कुल ठीक कहा है कि बच्चों के सपनों को खारिज करने से बड़ी कोई हिंसा नहीं है। उनके ये वाक्य दुनिया को जरूर झकझोर रहे होंगे कि मैं नहीं मानता कि दुनिया इतनी गरीब है। मैं यह नहीं मानता है कि हमारे मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों और अन्य प्रार्थना गृहों में हमारे बच्चों के सपनों के लिए जगह नहीं है। मैं नहीं मानता कि कानून, संविधान, जज और पुलिस हमारे बच्चों को सुरक्षित नहीं कर सकते। मैं नहीं मानता कि गुलामी की बेड़ियां आजादी की चाहत से ज्यादा मजबूत होती हैं।

दुनिया भर की सेनाओं पर एक हफ्ते में होने वाला खर्च हमारे सभी बच्चों को क्लासरूम दिला सकता है। उन्होंने कहा कि चलिए हम लोगों में दया भाव जगाते हैं और उसे वैश्विक आंदोलन में तब्दील करते हैं। निष्क्रिय दया भाव नहीं बल्कि परिवर्तनकारी दया भाव से ही न्याय, समता और स्वतंत्रता मिल सकती है। आज दुनिया में किसी चीज की कमी है तो वह दया भाव ही है। इसके चलते ही हमारा समाज दिन प्रतिदिन हिंसक होता जा रहा है। जिसका सबसे ज्यादा शिकार बच्चे और महिलाएं हो रही हैं।

वहीं मलाला के ये शब्द भेदभाव करने वाले समाज को आईना दिखाते हैं कि वह आज दुनिया की लड़कियों की आवाज इसलिए बन पाई हैं कि उसके पिता ने उसके पर नहीं कतरे बल्कि उड़ने दिया। मात्र 17 वर्ष की मलाला दुनिया को रास्ता दिखाती हैं कि एक बच्चा, एक शिक्षक, एक कलम और एक किताब दुनिया को बदल सकते हैं। वह सवाल पूछती हैं कि मौजूदा समय में सरकारों के लिए बंदूक, टैंक खरीदना आसान है, लेकिन बच्चों के लिए किताब खरीदना मुश्किल क्यों है? दुनिया के देश लड़ाई के लिए तो ताकतवर हैं, लेकिन शांति के लिए कमजोर क्यों दिखाई दे रहे हैं? इन दोनों ने विश्व जगत से साफ शब्दों में कहा है किकेवल बच्चों की शिक्षा से ही समाज में सुखद बदलाव आ सकते हंै। क्या विश्व नेता व दुनिया की सरकारें भी इन संदेशों को सुन रही हैं?

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