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चुनाव में खलल डालने की आतंकी साजिश

चुनाव की सफलता साफ बता रही है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता बुलेट की जगह बैलेट में अपना भविष्य देखने लगी है।

चुनाव में खलल डालने की आतंकी साजिश
जम्मू-कश्मीर में एक ही दिन में तीन अलग-अलग जगहों पर आतंकी हमले को पाक समर्थित आतंकवादियों की बौखलाहट का नतीजा माना जा सकता है। शुक्रवार को पहला हमला कश्मीर के उरी में सेना के कैंप पर हुआ। आतंकियों के साथ मुठभेड़ में सेना के ग्यारह जवान शहीद हो गए हैं, वहीं छह आतंकी भी मारे गए हैं। दूसरा हमला श्रीनगर के सौरा में हुआ, जहां आतंकियों के साथ मुठभेड़ में एक आतंकी मारा गया है। तीसरा हमला शोपिया के पुलिस थाने पर ग्रेनेड से हुआ। ये इलाके नियंत्रण रेखा से बिल्कुल सटे हुए हैं और यहां आने वाले दिनों में मतदान होने हैं।
राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए अब तक हुए दो चरणों के मतदान के दौरान रिकॉर्ड वोटिंग हुई है, जिससे साफ पता चलता है कि लोग खौफ के साये से निकलकर अपने मताधिकार का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। पहले चरण में 71 फीसदी मतदान हुआ था। वहीं दूसरे चरण में 72 फीसदी मतदान हुआ है। यह उत्साह आतंकियों और अलगाववादियों की गाल पर जोरदार तमाचे की तरह है। आतंकी इससे बौखलाए हुए हैं और यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में वहां ऐसी घटनाओं में तेजी देखी जा रही है। अभी गत दिनों श्रीनगर के लाल चौक पर ग्रेनेड से हमला किया गया था, जिसमें एक बच्चा सहित आठ लोग घायल हो गए थे।
इससे कुछ दिन पहले, जम्मू के अरनिया सेक्टर में भीषण मुठभेड़ में चार आतंकियों को मार गिराया गया था। आतंकियों के साथ मुठभेड़ में तीन जवान शहीद हो गए थे और पांच नागरिकों की भी जान चली गई थी। इसके साथ ही आतंकियों ने दहशत फैलाने के लिए एक सरपंच की भी हत्या कर दी। उनकी ओर से लोगों को लोकतंत्र के इस महापर्व में शामिल नहीं होने देने की हरसंभव कोशिश की जा रही है। लोगों में दहशत फैलाने के लिए ही आतंकी इस तरह के आत्मघाती हमले कर रहे हैं, परंतु इसके बाद भी वे जम्मू-कश्मीर की जनता को नहीं रोक पाए। इसे भारतीय लोकतंत्र की जीत और अलगाववादियों तथा पाक समर्थित आतंकवादियों की हार के रूप में देखा गया है।
घाटी के कई इलाकों में विकसित शहरों से भी अधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किए गए हैं। इससे जाहिर होता है कि राज्य की फिजा तेजी से बदल रही है। इसे एक संकेत के रूप में देखा जाए तो भी इसकी अहमियत काफी बढ़ जाती है। क्योंकि एक दौर था जब आतंकियों के भय से लोग बाहर निकलने से कतराते थे। पाकिस्तान यहां लोकतंत्र की जड़ों को जमने नहीं देना चाहता है। वह आतंकियों की मदद से भय का माहौल पैदा करना चाहता है पर अब वक्त बदल गया है।
चुनाव की सफलता साफ बता रही है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता, बुलेट की जगह बैलेट में अपना भविष्य देखने लगी है। उन्हें लगने लगा है कि लोकतंत्र ही उनकी समस्त समस्याओं का निदान कर सकता है। सूबे में लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूती मिल रही है। यह सबूत है, इस बात का भी कि कश्मीर बीती त्रासदियों को भुलाकर सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाना चाहता है। आम कश्मीरियों के इस रुख से पाक समर्थित आतंकवादी बौखला गए हैं और खिसियाहट में वे भारी मतदान में खलल डालना चाहते हैं।

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