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रक्षा एवं वैमानिकी के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात है तेजस

गत वर्ष देश में निर्मित युद्धपोत से लेकर पनडुब्बी तक को नौसेना में शामिल किया गया था।

रक्षा एवं वैमानिकी के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात है तेजस
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देश में बना पहला हल्का लड़ाकू विमान तेजस शनिवार को वायुसेना में शामिल हो गया। इसे भारतीय रक्षा एवं वैमानिकी के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात माना जा सकता है। 32 साल पहले देश में ही हल्के लड़ाकू विमान बनाने के इस मुश्किल और महत्वाकांक्षी सफर की शुरुआत हुई थी। साल 1983 में भारत सरकार ने मिग-21 विमान की जगह स्वदेशी तेजस को विकसित करने का जिम्मा डीआरडीओ (डिफेंस रिसर्च डेवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन) को सौंपा था, लेकिन तमाम परेशानियों से जूझते हुए यह अब जाकर विकसित हुआ है।
हालांकि अब भी उन्नत तकनीक से लैस तेजस को आने में समय लगेगा। वहीं अभी इसको शुरुआती परिचालन की ही मंजूरी मिली है। इसका मतलब है कि यह विमान विभिन्न हालात में उड़ान भर सकता है। इसे फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस मिलने में एक साल और लगेगा। उसके बाद ही यह वायुसेना में पूरी तरह काम कर सकेगा। इसका उत्पादन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक लिमिटेड कर रहा है। तेजस पांच तरीके से दुश्मनों के ठिकाने पर धावा बोल सकता है।
वर्तमान में वायु सेना के पास पुराने जमाने के 10 मिग-21 विमानों का बेड़ा है। एक बेड़े में 20-21 विमान मौजूद हैं। इसके स्थान पर अब तेजस के छह बेड़ों को शामिल किया जाएगा। उसके बाद वायुसेना की धार और मजबूत हो जाएगी। हालांकि तेजस के साथ चुनौतियां भी हैं। दुनिया में जो आधुनिक युद्धक विमान इस्तेमाल किए जा रहे हैं उनसे यह बहुत पीछे है।
इसमें कई तकनीक को सिर्फ दो सप्ताह पहले ही जोड़ा गया है। आधे रास्ते में आसमान में ही ईंधन को भरना, लंबी दूरी तक मिसाइल को ले जाना जैसी कई ऐसी चीजें हैं जो अगले साल फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस के बाद ही संभव हो पाएंगी। आज देश अपनी रक्षा तैयारियों को हर स्तर पर मजबूत कर रहा है। जल्द ही फ्रांस के साथ राफेल सौदे को अंतिम रूप दिया जाना है।
15 अरब डॉलर के इस समझौते के तहत 126 राफेल फाइटर जेट भारत को चरणबद्ध तरीके से मिलेंगे। इसके अलावा भारत रूस के साथ मिग-29 र्शेणी के अत्याधुनिक विमानों को भी खरीदेगा। वहीं भारत खुद पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान विकसित करने की योजना बना रहा है जो किसी भी रडार से बच निकलेगा।
अब भारत देश में ही रक्षा उपकरणों का निर्माण करने में रुचि लेने लगा है। केंद्र की मोदी सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति दी है। गत वर्ष देश में निर्मित युद्धपोत से लेकर पनडुब्बी तक को नौसेना में शामिल किया गया था। वहीं अग्नि, पृथ्वी आदि मिसाइलें थल सेना की ताकत में इजाफा कर ही चुकी हैं।
भारत एक परमाणु शक्ति पहले ही बन चुका है। दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े आयातक देश के लिए यह सुखद शुरुआत है। आज भी भारत अपनी जरूरतों का करीब 70 फीसदी रक्षा उपकरण आयात करता है और शेष जिनका यहां उत्पादन होता भी है उनमें भी ज्यादातर विदेशी कलपुर्जे ही लगे होते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भारत देश में ही रक्षा उपकरणों के उत्पादन की राह में कदम बढ़ा चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही विदेशों पर निर्भरता घटेगी।
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