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हिंसा के कारण जड़ों से कटने को मजबूर

संयुक्त राष्ट्र ने भी आर्थिक संकट से जूझ रहे कई देशों मसलन ग्रीस, इटली, हंगरी को उनको शरण और आर्थिक मदद देने की पेशकश की है।

हिंसा के कारण जड़ों से कटने को मजबूर
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तुर्की के तट पर तीन वर्षीय सीरियाई बालक आयलान कुर्दी की समंदर में डूबने से हुई मौत के बाद दुनिया शरणार्थीसमस्या पर जागी है। र्जमनी, ऑस्ट्रिया, ब्रिटेन सहित तमाम यूरोपीय देश पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों से आए लाखों शरणार्थियों को शरण देने के लिए आगे आने लगे हैं। पहले इन्हें अपनाने के मुद्दे पर यूरोपीय देश बंट गए थे। उनका तर्क था कि इससे आर्थिक मंदी का सामना कर रहे यूूरोप में नए तरह का संकट पैदा हो जाएगा। लिहाजा वे सख्ती दिखा रहे थे, लेकिन अब उनके रहने के लिए उचित व्यवस्था करने लगे हैं। इन देशों के स्थानीय निवासी भी मदद के लिए आगे बढ़े हैं। वहीं पोप फ्रांसिस ने यूरोप की प्रत्येक कैथोलिक पादरी बस्ती से एक शरणार्थी परिवार को पनाह देने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी आर्थिक संकट से जूझ रहे कई देशों मसलन ग्रीस, इटली, हंगरी को उनको शरण देने की एवज में आर्थिक मदद देने की पेशकश की है।

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दरअसल, पश्चिम एशिया और कई अफ्रीकी देश लंबे समय से भीषण गृहयुद्ध की चपेट में हैं। आतंकवाद ने यहां विकराल रूप धारण कर लिया है। इन क्षेत्रों की बड़ी आबादी भुखमरी का भी सामना कर रही है। पश्चिम एशिया के कई देशों जैसे सीरिया, लीबिया, इराक, यमन बीते कई सालों से हिंसाग्रस्त हैं। इन देशों में खूंखार आतंकवादी संगठन आईएस लगातार अपना विस्तार कर रहा है। वहीं नाइजीरिया में बोको हरम और अफगानिस्तान में अलकायदा व तालिबान कहर बरपा रहे हैं। हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी खतरनाक देशों की सूची में बना हुआ है, लिहाजा यहां से भी लोग सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन करने पर विवश हुए हैं। आतंकवादियों और विद्रोहियों ने इन देशों के कई क्षेत्रों को अपने कब्जे ले रखा है। जो उनके अनुसार नहीं चल रहा है, उन्हें तमाम यातनाएं देने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। जाहिर है, बुनियादी मौलिक अधिकार भी वहां के नागरिकों को नसीब नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार इन देशों में स्कूल जाने योग्य बच्चों की संख्या 34 मिलियन है, लेकिन हिंसा की वजह से अब आधे बच्चे स्कूल जाना छोड़ चुके हैं। लीबिया में ही 73 फीसदी से अधिक स्कूल बंद हो गए हैं।

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इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि इन देशों में हालात काफी गंभीर होते जा रहे हैं। ऐसे में लंबे समय तक हिंसा का कोई समाधान नहीं निकलने की सूरत में यहां के लोगों ने सुरक्षित ठिकाने की ओर जाना ही उचित समझा है। इस साल अगस्त तक सीरिया, लीबिया, इराक और आसपास के देशों से अब तक 4.5 लाख से अधिक शरणार्थी सुरक्षित स्थान की तलाश में अपने पड़ोसी देशों और यूरोपीय राष्ट्रों में आने की अनुमति मांगी है। जबकि गत वर्ष करीब 5.71 लाख शरणार्थियों ने इन देशों में पनाह लेने की अनुमति मांगी थी। ज्यादातर पलायन सीरिया और इराक से हो रहा है। इसके बाद अफगानिस्तान, लीबिया, नाइजीरिया, अफ्रीकी देश और पाकिस्तान हैं। माना जा रहा हैकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह अब तक का सबसे भीषण शरणार्थी संकट है। कुछ लोगों की बर्बर मानसिकता के कारण विश्व जगत के सामने आज इतनी बड़ी त्रासदी पैदा हो गई है कि एक बड़ी आबादी को अपनी जड़ों से मजबूरन कटना पड़ रहा है। आज सभी देशों को एकजुट हो कर आतंकवाद से लड़ने की दरकार है, जिसने इतनी बड़ी शरणार्थी समस्या पैदा की है।

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