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नौकरशाही को दबाव मुक्त बनाने की कोशिश

केंद्र सरकार का संबंधित नियमों में बदलाव का फैसला स्वागतयोग्य है।

नौकरशाही को दबाव मुक्त बनाने की कोशिश
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अखिल भारतीय सेवा यानी आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के अधिकारी राजनीतिक दबावों से मुक्त हो कर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकें इसके लिए केंद्र सरकार का संबंधित नियमों में बदलाव का फैसला स्वागतयोग्य है। यदि नए नियम लागू होते हैं तो केंद्र की अनुमति के बगैर राज्य सरकारें किसी भी आईएएस, आईपीएस या आईएफएस अधिकारी को एक हफ्ते से ज्यादा समय तक निलंबित नहीं रख सकेंगी। यही नहीं उन्हें केंद्र सरकार को निलंबन की पूर्व सूचना भी देनी होगी। हालांकि यह नियम उन मामलों पर लागू नहीं होगा जहां राज्य सरकारों की समीक्षा समिति ने निलंबन की अनुमति दे रखी है। ईमानदार और खुलकर फैसले लेने वाले अधिकारियों को निश्चित रूप से मोदी सरकार के इस फैसले से राहत मिली होगी। अकसर देखा जाता है कि राज्य सरकारें कईबार अपनी मनमर्जी से अधिकारियों को निलंबित कर देती हैं। इसके पीछे राजनीतिक और व्यक्तिगत कारण ही ज्यादा रहते हैं। अशोक खेमका, दुर्गा शक्ति नागपाल और कुलदीप नारायण आदि अधिकारी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। नौकरशाह लंबे समय से इस तरह के मनमाने निलंबन पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि उन पर हमेशा निलंबन की तलवार लटकती रहने से फैसले लेने में डर बना रहता है। ऐसे में यह कदम काफी अहम माना जा रहा है। हालांकि जानकार इस कदम को तकरार के रूप में भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में राज्य सरकारेें आपत्ति जता सकती हैं। देश में नौकरशाही को निर्भय और दबावमुक्त बनाने के लिए लंबे समय से प्रशासनिक सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। नौकरशाही में सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। बीते वर्ष अदालत ने प्रशासनिक अफसरों के तबादले और पदोन्नति के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड गठित करने का आदेश जारी किया था। साथ ही कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए नौकरशाहों से भी कहा था कि वे सरकार से कोई आदेश मौखिक न लेकर लिखित में लें। दरअसल, मौखिक आदेश भी भ्रष्टाचार के बड़े कारण बनते रहे हैं। दूसरे फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का तबादला दो साल से पहले नहीं हो। प्रमोशन होने, रिटायरमेंट होने, ट्रेनिंग पर जाने या दूसरे राज्य में डेपुटेशन होने पर यह अवधि कम हो सकती है। इससे पहले तबादला करने पर सिविल सर्विसेज बोर्ड को कारण बताना होगा। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि नौकरशाही पर राजनीति हावी है। इसकी वजह से अधिकारी कई जरूरी कदम भी नहीं उठा पाते हैं। और जो उनके खिलाफ जाते हैं उन्हें तबादले, निलंबन और पदोन्नति का भय दिखाया जाता है। बार-बार के निलंबन और तबादले से जरूरी कामकाज प्रभावित होते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन फैसलों के अमल में आने के बाद यह सब खत्म होगा। अधिकारियों को एक निश्चित अवधि तक अपने पद पर काम करने का अवसर मिलने से उनकी जवाबदेही सुनिश्चित होगी। क्योंकि खराब प्रशासन के कारण विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाई आ रही है।
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