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अब कोल ब्लॉक आवंटन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं

यह स्वागतयोग्य फैसला है इससे प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबांट पर रोक लगेगी।

अब कोल ब्लॉक आवंटन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1993 से 2010 तक आवंटित हुए कुल 218 कोल ब्लॉक्स में से 214 कोल ब्लॉक्स आवंटन को रद्द कर कोयला जैसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन के आवंटन प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया है। बीते 25 अगस्त को ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी कोल ब्लॉक आवंटन को गैर-कानूनी बता दिया था। कोर्ट ने कहा था कि कोल ब्लॉक आवंटन का पहले आओ-पहले पाओ का तरीका गलत था। अब बुधवार के इस फैसले का अर्थ यह हैकि 214 कोल ब्लॉक्स सरकार के नियंत्रण में चले गए हैं और आगे इनका आवंटन नीलामी प्रक्रिया द्वारा होगा। ताजा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ चार कोल ब्लॉक्स को छोड़, जिसमें केवल सरकारी कंपनियां खनन कार्य कर रही हैं, सभी को रद्द कर दिया है। वहीं 214 में से 42 निजी कोल ब्लॉक्स जिसमें अभी खनन कार्य चल रहा है, उन्हें छह माह की छूट दी गई है, देश में कोयले का उत्पादन प्रभावित न हो और देश में कोयले की कमी से ऊर्जा संकट पैदा न हो, इसीलिए कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है। अर्थात अगले छह महीने तक निजी कंपनियां इन 42 खदानों में से कोयला निकाल सकती हैं, और 31 मार्च 2015 तक उन्हें खदान खाली करने होंगे। इसके बाद ये भी सरकार के अधीन आ जाएंगी। इस बीच केंद्र सरकार को नीलामी की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। यह स्वागतयोग्य फैसला है इससे प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबांट पर रोक लगेगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्टने कहा है कि निजी कंपनियों ने अब तक जितना भी कोयला खनन किया है, उस पर 295 रुपये प्रति टन के हिसाब से जुर्माना देना होगा। दरअसल, जनहित याचिकाओं में शुरू में करीब 194 कोयला खदानों के आवंटन में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा गया था कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान सही तरीके से आवंटन नहीं किया गया, लेकिन बाद में शीर्ष अदालत ने 1993 से किये गये आवंटन को जांच के दायरे में ले लिया था। वहीं वर्ष 2012 में पहली बार अपनी एक रिपोर्ट में कैग ने कोल ब्लॉक्स के आवंटन को लेकर सवाल उठाए थे और कहा था कि यूपीए के शासन के दौरान हुए आवंटन से सरकार को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। दरअसल, लंबे समय से देश में कोयला सेक्टर एक किस्म की बुनियादी खामी का शिकार रहा है। कारोबारियों, नेताओं, अफसरों और अपराधियों का एक गठजोड़ कोयला खदानों के दोहन से लेकर प्रबंधन तक में अपना एकाधिकार बनाए रखने में कामयाब रहा है। नीतियों को प्रभावित करने में भी इस गठजोड़ की भूमिका रही है। आगे खदानों की नीलामी से चीजें कुछ हद तक संभलेंगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। यह फैसला उद्योग जगत के लिए भी सबक है कि वह भ्रष्ट तरीके से कारोबार करने से बाज आए। केंद्र सरकार ने पहले ही कह दिया है कि कोर्ट के फैसले को वह लागू करेगी, साथ ही देश में बिजली की कमी नहीं होने देगी। इस फैसले ने नरेंद्र मोदी सरकार को सिस्टम की एक बड़ी बीमारी को दूर करने का अवसर दिया है। अब ऐसा रास्ता निकालना होगा कि कुछ लोगों की गड़बड़ियों का खामियाजा पूरे देश को न भुगतना पड़े।
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