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चिंतन: सूफीवाद की मजबूती से होगा आतंक का खात्मा

सभी आतंकी गुट इस्लाम के नाम पर ही युवकों को गुमराह करते हैं।

चिंतन: सूफीवाद की मजबूती से होगा आतंक का खात्मा
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जब समूची दुनिया कट्टर इस्लामी आतंकवाद से त्रस्त है और इस्लाम के नाम पर बेगुनाह गैर-मुस्लिमों को काफिर करार देकर उनके कत्लेआम को जायज ठहराया जा रहा हो, उस समय भारत में विश्व सूफी फोरम का चार दिनी मजलिस होना इस्लाम के असली रूप को जानने-समझने का बड़ा अवसर देता है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सक्रिय आतंकी संगठनों ने पाक मजहब 'इस्लाम' का ऐसा हिंसक व कट्टर जेहादी चेहरा बना दिया है कि इस्लाम हिंसा का पर्याय लगने लगा है।

समूचा पश्चिम जगत वर्षों से ताकत और हथियार के बल पर इस्लामी आतंकवाद को कुचलना चाहता है, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। उल्टे कट्टर इस्लामी गुटों का और विस्तार हो रहा है। अरब जगत में ही हजारों आतंकी गुट हैं। एशिया, अफ्रीका भी ऐसे गुटों के गढ़ बन गए हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान तो जैसे इन गुटों का 'मक्का' ही हो। सभी आतंकी गुट इस्लाम के नाम पर ही युवकों को गुमराह करते हैं। वे गुमराह इसलिए हो भी जाते हैं कि धर्म के कई स्वयंभू ठेकेदार इस्लाम का कट्टर चेहरा उनके सामने रखते हैं। इन आतंकी संगठनों और कुछेक कट्टर मौलवियों के चलते इस समय पूरी दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा धर्म 'इस्लाम' की साख संकट में है।

ऐसे में इस्लाम की आध्यात्मिक पहचान 'सूफीवाद' से उसे संजीवनी मिल सकती है। उसमें भी सूफीवाद पर भारत में ग्लोबल सम्मेलन उसके महत्व को और बढ़ाता है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि शांति और सद्भाव का संदेश देने वाले इस्लाम के लिए इस समय सूफीवाद उम्मीद का नूर (रोशनी) है। उन्होंने एक मार्के की बात भी कही कि आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ सैन्य, खुफिया या कूटनीतिक तरीकों से नहीं लड़ा जा सकता, बल्कि हम मूल्यों की ताकत और धर्म के वास्तविक संदेश के माध्यम से जीत सकते हैं। निश्चित ही इस्लाम का यह संदेश सूफीवाद में निहित है।

अबू नस्र अल सिराज की पुस्तक किताब-उल-लुमा में किए गए उल्लेख के आधार पर माना जाता है कि सूफी शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द सूफ (ऊन) से हुई, जो पवित्रता का प्रतीक है। सूफीवाद आठवीं से दसवीं सदी में इराक के बसरा में जन्मा। संयोग से आज वही इलाका इस्लामी आतंकवाद से ग्रस्त है। भारत में यह बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में आया प्रतीत होता है, क्योंकि उसी दौर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के सूफीवाद के प्रचार-प्रसार का प्रमाण मिलता है। सूफी प्रेम का मार्ग है।
यह मनुष्य की आध्यात्मिकता को प्रकट करने वाली जीवनशैली है। अरबी में सूफीवाद को तसव्वुफ कहा जाता है। अद्वैतवाद से साम्य रखने वाले इस सिद्धांत ने इस्लाम को एक नया नजरिया दिया है। यह बौद्ध धम्म से भी प्रेरित लगता है। सूफीवाद दरअसल मोहब्बत से इबादत का रास्ता है। यह मानव के अंतर्मन को पवित्र बनाने और आत्मा की शुद्धि का मार्ग बताता है। दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह और अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह देश में सूफीवाद के दो बड़ा केंद्र हैं। इस सूफी सम्मेलन से भारत से पूरी दुनिया में इस्लाम के शांति और भाईचारे का पैगाम जाएगा। इतना ही नहीं इस्लाम के नैतिक मूल्यों को स्थापित करने और आतंकवाद के खिलाफ वैचारिक लड़ाई में सूफीवाद अहम भूमिका निभा सकता है।
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