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चिंतन: राज्य बोर्डों के छात्रों को एनईईटी से मिली राहत

मोदी कैबिनेट ने एनईईटी को टालने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दी है।

चिंतन: राज्य बोर्डों के छात्रों को एनईईटी से मिली राहत

एमबीबीएस और बीडीएस कोसरें में दाखिला के लिए देशभर में एक ही कॉमन मेडिकल टेस्ट 'राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा' (एनईईटी) के एक साल टल जाने से डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाले कुछ छात्रों को राहत मिली है। मोदी कैबिनेट ने एनईईटी को टालने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दी है। इस अध्यादेश पर अभी राष्ट्रपति का मुहर लगना बाकी है। केंद्र सरकार को यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आंशिक रोक लगाने के लिए लाना पड़ा है।

हालांकि सरकार ने अध्यादेश लाने में देरी कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गत एक मई को एनईईटी के प्रथम चरण की परीक्षा हो चुकी है। दूसरे चरण की परीक्षा 24 जुलाई को प्रस्तावित है। 17 अगस्त को रिजल्ट आना था व 30 सितंबर तक दाखिले की प्रक्रिया पूरी होनी थी। अध्यादेश के लागू होने के बाद राज्य बोडरें के छात्रों को एनईईटी की 24 जुलाई की होने वाली परीक्षा में नहीं बैठना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्व के फैसले को पलटते हुए सरकारी मेडिकल कॉलेजों, डीएम्ड यूनिवर्सिटियों और निजी मेडिकल कालेजों में एडमिशन के लिए एक ही एंट्रेंस टेस्ट 'एनईईटी' इसी साल से कराने के आदेश दिए थे।

वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने मेडिकल कोसरें के लिए सिंगल एंट्रेंस टेस्ट कराने का निर्णय किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ही खारिज कर दिया था। उसके बाद मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने शीर्ष कोर्ट में रिव्यू याचिका दायर की थी, जिस पर एनईईटी कराने का फैसला आया था। जिसका केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने स्वागत किया था। पर अब इस अध्यादेश के बाद राज्यों के बोर्ड इस सत्र के लिए अपने हिसाब से मेडिकल प्रवेश परीक्षा करा सकेंगे। लेकिन इस अध्यादेश का मतलब कतई यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है या वह इसे निजी मेडिकल कॉलेज संचालकों की लॉबी के दबाव में पलटना चाहती है।

दरअसल, सर्वोच्च अदालत का जब यह फैसला आया था, उसी समय कई राज्यों व निजी कॉलेजों ने इसके अमल में परेशानी जताई थी। गुजरात ने तर्क दिया कि हजारों छात्र गुजराती में मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट देते हैं, ऐसे में अचानक अंग्रेजी में टेस्ट देना होगा तो छात्रों को दिक्कत होगी। गुजरात में एक अनुमान के मुताबिक सालाना 68 हजार छात्रों में से करीब 60 हजार गुजराती में टेस्ट देते हैं। जम्मू-कश्मीर का तर्क था कि विशेष दज्रे के चलते सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल के लिए उसे राज्य विधानसभा में बिल पास करना होगा और राज्य में स्थानीय छात्रों को आरक्षण के कारण कोर्ट के निर्णय से वे छात्र प्रभावित होंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश भी विरोध जता चुके हैं।

निजी कालेजों ने इससे स्वायत्ता के हनन की बात कही थी। केवल दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने इस अध्यादेश का विरोध किया है। साथ ही याचिकाकर्ताओं ने भी 24 जुलाई से पहले अध्यादेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। अध्यादेश पर कोर्ट का फैसला क्या होगा, यह तो बाद की बात है, सरकार व कोर्ट में खींचतान भी हो सकती है, लेकिन फिलहाल इससे राज्य बोडरें के छात्रों को राहत जरूर मिल गई है।

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