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छोटे किसानों को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ

आज देश के 90 फीसदी किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम कृषि योग्य जमीनें हैं।

छोटे किसानों को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ
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भारतीय कृषि और इस पर निर्भर परिवारों की हालत किस प्रकार दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है इसका प्रमाण शुक्रवार को नेशनल सैंपल सर्वे आॅर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) द्वारा जारी 70वें राउंड की रिपोर्ट में दर्ज है। जुलाई 2012 से जून 2013 के बीच देश के करीब 35 हजार कृषि परिवारों से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित ‘भारत में कृषि परिवारों की स्थिति का आकलन’ नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कृषि जोतों का आकार लगातार कम हो रहा है।

आज देश के 90 फीसदी किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम कृषि योग्य जमीनें हैं। वहीं 52 फीसदी से ज्यादा कृषि परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। सबसे ज्यादा आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के किसान सहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं। सर्वे में यह बात सामने आई है कि कृषि परिवार कर्ज के लिए गैर-सरकारी स्रोतों जैसे साहूकार आदि पर ज्यादा निर्भर हैं। देश में कुल कृषि कर्ज का 40 फीसदी हिस्सा गैर-सरकारी स्रोतों से लिया जाता है। सिर्फ 15 फीसदी छोटे और सीमांत किसान ही सरकारी स्रोतों से कर्ज ले पाते हैं।

हालांकि बड़े जोतों वाले किसानों की स्थिति कुछ बेहतर पाई गई है। वे करीब 80 फीसदी कर्ज सरकारी स्रोतों से प्राप्त कर लेते हैं। जाहिर है, कृषि ऋण माफी योजना का लाभ बड़े किसानों के हिस्से ही अधिक जाता है। एनएसएसओ ने उन परिवारों को कृषि परिवार माना है जिसमें कम से कम एक सदस्य कृषि कार्य करता हो और वह कम से कम तीन हजार रुपए मूल्य का सालाना कृषि उत्पादन करता हो। इस परिभाषा के आधार पर देश के 58 फीसदी ग्रामीण परिवार कृषि परिवार की श्रेणी में आते हैं। इन कृषि परिवारों की औसत आय करीब छह हजार रुपए पाई गई है।

सर्वे के तथ्यों से साफ है कि कृषि से आय लगातार कम हो रही हैऔर उनकी आय में गैर-कृषि आय का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। सर्वे के अनुसार कृषि परिवारों के एक बड़े हिस्से के पास राशन कार्ड नहीं है जिससे वे सस्ती दरों पर मिलने वाली खाद्यान्न योजना का लाभ नहीं उठा पाते हैं। वहीं बहुत कम किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में जानकारी है। यही वजह है कि किसान अपनी पैदावर को कम कीमत पर बिचौलियों के हाथों बेच देते हैं। वहीं कृषि बीमा योजना के बारे में भी इन्हें न के बराबर जानकारी है।

देश में करीब 95 फीसदी धान और गेहूं तथा 99 फीसदी गन्ना उगाने वाले किसान अपनी फसल की बीमा नहीं कराते हैं। इसके अलावा किसानों की नई तकनीक और सरकारी शोध संस्थाओं से लगातार दूरी बनी हुई है। ज्यादातर किसानों को नई चीजों के बारे में बड़े किसानों या मीडिया से पता चलता है। एनएसएसओ ने 2003 में भी इसी तरह का एक सर्वे किया था। आज दस साल बाद भी किसानों की दशा में कोई बदलाव नहीं आया है! जबकि सरकार द्वारा जारी कृषि संसाधानों की मात्रा करीब चार गुनी बढ़ गई है। ये आंकड़े साफ दर्शा रहे हैं कि छोटे और सीमांत किसानों को कृषि योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। सवाल यह है कि सरकारी संसाधनों का लाभ तब उठा कौन रहा है? यह चिंता की बात है कि देश की बड़ी आबादी सरकारी नीतियों और योजनाओं से लगभग बाहर है।

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