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शेयर बाजार में बड़ी गिरावट चिंताजनक, कच्चे तेल में हो रही है भारी कमी

शेयर बाजार में हर कदम अनिश्चितता से भरा होता है।

शेयर बाजार में बड़ी गिरावट चिंताजनक, कच्चे तेल में हो रही है भारी कमी

बंबई स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स मंगलवार को साढ़े पांच साल की सबसे बड़ी गिरावट का शिकार हुआ। इस गिरावट के कारण एक ही दिन में 2200 से अधिक कंपनियों के लाखों शेयरधारकों की तीन लाख करोड़ा रुपये की पूंजी डूब गई। गत वर्ष शेयर बाजार में करीब तीस फीसदी की वृद्धि दर्जकी गई थी। जिसकी वजह से शेयरधारकों को बढ़िया रिटर्न भी मिला था। ऐसे में एक ही दिन में इतनी बड़ी गिरावट चिंताजनक है।

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दरअसल, शेयर बाजार में हर कदम अनिश्चितता से भरा होता है। वैसे भी ग्लोबलाइजेशन के दौर में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय हर उतार-चढ़ाव या अच्छी-बुरी खबरों का इस पर प्रभाव पड़ता है। इस गिरावट की वजह भी ग्रीस संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हो रही भारी कमी है। ग्रीस की अर्थव्यवस्था मंदी में फंसी हुई है। तमाम कदमों के बाद भी उसकी हालत नहीं सुधर रही है। ऐसे में उसके यूरोपियन यूनियन से बाहर जाने की अटकलें फिर तेज हो गई हैं। उसे लगता है कि वह बाहर निकलकर अपनी अर्थव्यवस्था को सुधार लेगा। वहीं कच्चे तेल की कीमत में गिरावट जारी है।

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दुनिया में मांग से ज्यादा आपूर्ति होने की आशंका से कच्चे तेल के दाम पचास डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इसकी कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। जाहिर है,कच्चे तेल की कीमतों को लेकर दुनिया भर के बाजारों में एक तरह से अनिश्चितता बनी हुई है। इन दोनों घटनाओं के कारण मंगलवार को विदेशी निवेशकों में हड़कंप मच गया और वे मंदी की आशंका के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों से अपना पैसा निकालने लगे। इस भारी बिकवाली का शिकार भारतीय शेयर बाजार भी हुआ। दरअसल, अमेरिका, चीन, जापान और यूरोप के कई देशों में कच्चे तेल की मांग में कमी आई है। अमेरिका में जहां शेल क्रांति के चलते कच्चे तेल की आयात में कमी आई है, वहीं चीन और यूरोप के कई देशों में मंदी के आसार बने हुए हैं। लिहाजा वहां र्इंधन की खपत में गिरावट आई है। गत दिनों विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया था कि इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर में कमी आएगी। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि कच्चे तेल की मांग कम हो गई है, लेकिन पूर्ति में कमी नहीं आने से बाजार में इसकी उपलब्धता में कोई कमी नहीं आई है।

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पहले ऐसी स्थिति में तेल निर्यातक देशों का संगठन ओपेक कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती कर कीमतों को समायोजित कर देता था, परंतु इस बार उत्पादन में कटौती के बारे में सहमति नहीं बनी। सऊदी अरब जैसे देश इस तरह उत्पादन कम कर तेल बाजार में अपनी हिस्सेदारी खोना नहीं चाहते हैं। उन्हें डर हैकि कच्चे तेल की कीमत ऊंची रहने से अमेरिका शेल क्रांति के दम पर उनके बाजार को छीन लेगा। कच्चे तेल की निम्न कीमत भारत के लिए सुनहरा अवसर लेकर आया है। एक तरफ यह जहां महंगाई, चालू खाता घाटा और राजकोषीय घाटा कम करने में मददगार है। वहीं अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए सस्ता र्इंधन काफी मुफीद है, लेकिन जिन देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर करती है उनके लिए यह स्थिति खतरनाक है। अरब देशों और रूस की हालत चिंताजनक होने लगी है। स्पष्ट है, वैश्विकरण के युग में एक देश की अर्थव्यवस्था संकट में फंसती है तो दूसरे देश भी प्रभावित होते हैं। ऐसे में वर्तमान समय एक तरफभारत के लिए हितकर है तो दूसरी तरफ हानिकारक भी।

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