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पेट्रोलियम मंत्रालय जासूसी केस:महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का मामला गंभीर

जासूसों का गैंग पेट्रोलियम मंत्रालय के दस्तावेज चुराता था और मोटी रकम में बेचता था।

पेट्रोलियम मंत्रालय जासूसी केस:महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का मामला गंभीर

पेट्रोलियम मंत्रालय से महत्वपूर्ण दस्तावेजों को चुराकर उन्हें ऊर्जा क्षेत्र की निजी कंपनियों को बेचने का मामला काफी गंभीर है। इस मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है जिसमें सरकारी कर्मचारी, बिचौलिए, पत्रकार और निजी कंपनियों के कर्मचारी शामिल हैं। ये लोग जिन दस्तावेजों को लीक करने की कोशिश कर रहे थे, वे गोपनीय दस्तावेज थे और इन गोपनीय दस्तावेजों तक किसी सामान्य कर्मचारी की पहुंच नहीं होती, जिससे ये जाहिर होता है कि इस जासूसी कांड में कोई बड़ा अधिकारी भी शामिल हो सकता है।

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पकड़े गए आरोपियों के पास से जो दस्तावेज पाए गए हैं उनमें ऊर्जा मूल्य निर्धारण और नीतिगत मामलों से जुड़ी जानकारियां हैं। माना जा रहा हैकि मंत्रालय में अहम दस्तावेजों की चोरी पिछले पांच-छह सालों से हो रही थी। जासूसों का गैंग पेट्रोलियम मंत्रालय के दस्तावेज चुराता था और मोटी रकम में बेचता था। उनका मुख्य मकसद सरकार के नीतिगत फैसलों, बैठकों के ब्योरे, मंत्रालय के आदेशों और प्रस्तावों की जासूसी करना होता था। इस प्रकार वे मंत्रालय की गोपनीय जानकारी कंपनियों, थिंक टैंक और लॉबिस्टों तक पहुंचाते थे। इसके लिए जासूस अवैध पहचान पत्र के आधार पर मंत्रालय में घुस जाते थे और सरकारी कर्मचारियों की मदद से दस्तावेजों को चुराकर इनकी फोटोकॉपी ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों के लिए काम करने वालों को बेच देते थे।

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कई कंपनियों ने तो इस काम के लिए कंसलटेंसी तक को हायर कर रखी है। एक बार सरकार की पॉलिसी की जानकारी मिल जाने के बाद से कंपनियां उसके अनुसार अपनी योजनाएं बनाती थीं और यदि सरकार की पॉलिसी उनके प्रतिकूल प्रतीत होती तो वे उसे अनुकूल बनाने के लिए हरसंभव कोशिश करती थीं। मंत्रालय से इस कदर जानकारी चुराने की आखिर वजह क्या है?

दरअसल, घरेलू ऊर्जा उद्योग पर मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है। सरकार का एक छोटा सा फैसला निजी कंपनियों के लिए करोड़ों रुपये के लाभ-हानि का कारण बन जाता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में गंभीर रूप से लॉबिंग की जाती है। उनका मकसद ऊर्जा संबंधी कीमतों से जुड़े सरकारी फैसलों का सुराग लेकर फायदा उठाना होता है। भारत को ऊर्जा संबंधी मांग पूरी करने के लिए अपने तेल का 80 फीसदी व गैस का 40 फीसदी आयात करना पड़ता है।

पूर्व में यूपीए सरकार के दौरान भी कई बार निजी क्षेत्र की कंपनियों का पेट्रोलियम मंत्रालय में दखल सामने आ चुका है। पूर्व पेट्रोलियम मंत्री एस जयपाल रेड्डी का प्रकरण सभी को याद होगा। दरअसल, यूपीए सरकार के दौरान मंत्रालयों में बिचौलिए व लॉबिस्टों की आवाजाही काफी बढ़ गई थी। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से उन पर अंकुश लगा है। अब मंत्रालयों में बाहरी लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। उसी का परिणाम है कि इन लोगों को पकड़ा जा सका है। अब इस मामले की गहन जांच होनी चाहिए। जिससे पता चल सके कि किन-किन कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई है। जो भी दोषी पाए जाएं उन्हें कड़ी सजा दी जानी चाहिए। आधिकारिक दस्तावेजों की चोरी स्वतंत्र और निष्पक्ष सरकार की राह में बाधा है।

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