Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

देश में वैज्ञानिक कार्यों को लेकर चिंता वाजिब

भारत ने पिछले साठ साल में न तो ऐसा कोईआविष्कार किया है जिससे कि दुनिया में उसकी चर्चा हो और न ही कोई बेहद अहम विचार दिया है

देश में वैज्ञानिक कार्यों को लेकर चिंता वाजिब
X

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के दिग्गज उद्यमी एनआर नारायण मूर्ति ने कहा है कि भारत ने पिछले साठ साल में न तो ऐसा कोईआविष्कार किया है जिससे कि दुनिया में उसकी चर्चा हो और न ही कोई बेहद अहम विचार दिया है जिससे कि दुनिया को ज्ञान प्राप्त हुआ हो। पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों के अपने समकक्षों के बराबर बुद्धि और ऊर्जा के बावजूद भारतीय युवा बेहद असरदार शोध करने में विफल रहे हैं। नारायाण मूर्ति ने देश में वैज्ञानिक कायरें को लेकर जो सवाल उठाए हैं वे एकदम सही हैं। यदि भारत वैज्ञानिक कायरें (नए आविष्कार और शोध पत्र के प्रकाशन) में दुनिया के टॉप टेन देशों में नहीं है तो इसका कारण सरकार की ओर से इस कार्य के लिए ऊंट के मुंह में जीरा जीतना फंड मिलना और विश्वविद्यालयों में इसके लिए मानक रूपरेखा का अभाव होना है। इस मोर्चे पर देश इसलिए भी विफल हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र हमारी सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रहा है। यही वजह है कि विश्व के 166 देशों की सूची में नवप्रवर्तन के मामले में भारत की स्थिति काफी निराशाजनक है।

जापान की संसद में पास हुआ सुरक्षा विधेयक, विपक्षी दलों ने किया विरोध प्रदर्शन

भारत इस सूची में 66वें स्थान पर है। आर्थिक महाशक्ति बनने का दंभ भरने वाले, परमाणु शक्ति संपन्न और अंतरिक्ष फतह करने वाले देश के लिए यह शर्म की बात है। भारत में शोध कायरें पर विकसित देशों की तुलना में जीडीपी का बहुत कम हिस्सा 4.6 फीसदी खर्च किया जाता है, जो कि बहुत कम है। इसमें जल्द से जल्द बढ़ोतरी करने की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी समाज का विकास ज्ञान-विज्ञान से ही संभव है। भारत का भी भविष्य यदि सुरक्षित करना है तो सरकार को विज्ञान की शिक्षा पर जोर देना होगा। मौजूदा दौर में वैज्ञानिक दृष्टि से विकसित देश ही विकास की पथ पर अग्रसर हो मानव कल्याण सुनिश्चित कर सकते हैं। आज किसी भी देश की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता उसकी आर्थिक प्रगति का पैमाना बन चुकी है। पश्चिमी देशों का दुनिया भर में दबदबा इसलिए भी कायम है, क्योंकि ज्ञान-विज्ञान में वे दूसरे देशों से आगे रहे हैं। लगभग सभी खोजें मसलन कार, बल्ब, रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, वाईफाई, रोबोट, जीपीएस, माइक्रोचिप और अन्य गैजेट्स व प्रौद्योगिकी में पश्चिमी विश्वविद्यालयों के शोध का हाथ रहा है। दुर्भाग्य है कि हमारे नीति निर्माता इस बात को नहीं समझ रहे हैं या समझकर अनदेखा कर रहे हैं।

म्यांमार के विकास में सहयोग करेगा भारत, कृषि और उर्जा क्षेत्र में निभाएंग अहम भूमिका

अमेरिका दुनिया भर में हो रहे शोध कायरें में करीब 17 फीसदी हिस्सेदारी के साथ शीर्षपर है। उसके बाद 12 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ चीन है। भारत की हिस्सेदारी महज 3 फीसदी ही है। भारत शोध पत्रों की संख्या में ही नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता में भी पीछे है। वहीं दुनिया के ज्यादातर विकसित देश वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने के लिए अपने शोध फंड का 30 प्रतिशत तक विश्वविद्यालयों को देते हैं, मगर अपने देश में यह प्रतिशत सिर्फ छह है। स्थिति बदलनी है तो देश में विज्ञान के लिए न सिर्फ वातावरण तैयार करना होगा, बल्कि सरकार को इसे अपनी प्राथमिकता सूची में शीर्ष स्थान देना होगा। आज विशुद्ध विज्ञान विषयों से छात्रों का मोहभंग हो रहा है और वे बेहतर करियर के लिए इंजीनियरिंग विषयों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। विज्ञान को रुचिकर बना इसे रोजगार से जोड़ना होगा। स्पष्ट है, देश में स्तरीय आविष्कार हो सके, इसके लिए विज्ञान शिक्षा और शोध के लिए माहौल बनाने और समुचित फंड देने की जरूरत है।

सरोगेसीः दुनिया के सबसे पावरफुल गर्भाशय वाली मां, 20 साल में जन्मे 15 बच्चे

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top