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बड़े बदलाव का सबब बनेगा यह फैसला

यह फैसला देश में करीब पांच लाख ट्रांसजेंडर लोगों के लिए बड़े बदलाव का सबब बन सकता है।

बड़े बदलाव का सबब बनेगा यह फैसला
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में किन्नरों यानी ट्रांसजेंडर्स को पुरुष और महिलाओं से अलग थर्ड जेंडर यानी तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी है। साथ ही कहा है कि दूसरे नागरिकों की तरह ये भी समान संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के हकदार हैं। यह फैसला देश में करीब पांच लाख ट्रांसजेंडर लोगों के लिए बड़े बदलाव का सबब बन सकता है। नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (नाल्सा) की ओर से सुप्रीम कोर्टमें इस संबंध में एक जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसकी सुनवाई के दौरान जस्टिस केएस राधाकृष्णन और जस्टिस एके सिक्री की बेंच ने मंगलवार को यह व्यवस्था दी।
दुनिया में ऐसा पहली बार हुआ है, जब तीसरे लिंग को औपचारिक ढंग से पहचान मिली है। इससे पहले देश में किन्नरों को अपना लिंग बताते वक्त मजबूरी में पुरुष या महिला लिखना पड़ता था। और ऐसा करने के दौरान वे अपनी पहचान साबित नहीं कर पाते थे। फॉर्म में तीसरे लिंग की कोई व्यवस्था नहीं होने की वजह से केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की सेवाओं से वे वंचित हो जाते थे, परंतु अब ऐसा नहीं होगा। इस फैसले के बाद वे भी सभी सरकारी सुविधाओं के हकदार होंगे।
कोर्ट ने इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला भी दिया है और कहा हैकि किन्नरों को उनके अधिकारों से वंचित रखना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। किन्नर भी इस देश के नागरिक हैं और उन्हें भी शिक्षा, काम पाने और सामाजिक बराबरी हासिल करने का पूरा हक है। इन अधिकारों को केवल स्त्री पुरुष तक सीमित नहीं रखा जा सकता। हालांकि यह दुर्भाग्य ही हैकि देश में किन्नरों को कानूनी पहचान देने के लिए अलग से कानून नहीं बन सका है पर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सुध ली है और उन्हें कानूनी पहचान देने का ऐतिहासिक कदम उठाया है।
यही नहीं शीर्ष अदालत ने उनकी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को दूर के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कई दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। मसलन किन्नरों को ओबीसी वर्ग में रखा जाए और उन्हें शिक्षा तथा नौकरियों में आरक्षण दिए जाएं। अब तुरंत केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को उनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान और उनके मानवाधिकारों की रक्षा के कार्य में जुट जाना चाहिए। देखा जाए तो देश में हर तरफ से यह वर्ग उपेक्षित और वंचित है। ये समाज में हेय दृष्टि से देखे जाते हैं।
हालांकि इसकी वजह सामाजिक चेतना का अभाव है। किन्नर समुदाय को मुख्यधारा में लाने के लिए दो स्तरों पर काम करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। एक तो तीसरे लिंग के रूप में मान्यता प्रदान करना, जो कि सुप्रीम कोर्टने पूरी कर दी है। वहीं उनके प्रति सामाजिक सोच में बदलाव लाने की भी आवश्यकता है। हालांकि इसके लिए सरकार को जागरूकता कार्यक्रम चलाने होंगे। जाहिर है, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इसके लिए कई दिशा-निर्देश दिए हैं। सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुदृड़ होने से समाज में उनकी मौजूदगी कायम होगी और उनके प्रति नजरिया बदलने से उनके मानवाधिकारों की रक्षा होगी।
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