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मनमोहन सिंह के कमजोर प्रधानमंत्री होने की पुष्टि!

अब यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि यूपीए सरकार में सत्ता के दो केंद्र हैं।

मनमोहन सिंह के कमजोर प्रधानमंत्री होने की पुष्टि!
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नई दिल्ली. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू ने अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर द मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह के जरिए जो कुछ सार्वजनिक किया है, उससे देश पहले से वाकिफ है। अब इस पुस्तक से उन बातों की पुष्टि हो गई है। किताब में कही गई बातों पर प्रधानमंत्री कार्यालय और कांग्रेसी नेता नाहक ही नाराजगी जाहिर कर रहे हैं और बारू को खरी-खोटी सुना रहे हैं।
अब यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि यूपीए सरकार में सत्ता के दो केंद्र हैं। वहीं विपक्ष तो पहले ही डॉ. मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री होने का आरोप लगा चुका है। स्वयं कांग्रेस के दिग्गज नेता भी इस सच को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकारते रहे हैं। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के उस बयान को आखिर कौन भूल सकता, जिसमें उन्होंने यूपीए की सरकार में सत्ता के दो केंद्र के प्रयोग के सफल नहीं हो पाने के कारण निराशा जतायी थी।
अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं जब प्रधानमंत्री ने मीडिया से वार्ता करने के दौरान यह स्वीकारा था कि कांग्रेस अध्यक्ष की इच्छाओं का सम्मान होता है। लिहाजा संजय बारू के द्वारा लिखी गई सारी बातें आम धारणा की ही पुष्टि करती हैं। दरअसल, सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात, जो पुस्तक में दर्ज है, डॉ. मनमोहन सिंह का हर बड़े फैसले के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने इस कदर निरीह और असहाय हो जाना है। कांग्रेसी भले ही संजय बारू की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें, परंतु इस पर बहस का कोई खास औचित्य नहीं है कि उनको प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में ऐसी किताब लिखनी चाहिए थी या नहीं, क्योंकि ऐसा कहीं भी उल्लेख नहीं है कि किसी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार अपने अनुभवों को नहीं लिख सकता।
कांग्रेसी नेता यह कह रहे हैं कि संजय बारू की यह पुस्तक काल्पनिक है? चुनावी माहौल में ऐसे कुतकरें से वे अपने प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के बचाव में कुछ भी क्यों न कहें, सच्चाई छिपने वाली नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में प्रधानमंत्री पद की गरिमा, हनक, प्रतिष्ठा कम हुई है। वहीं दस वर्षों तक केंद्र सरकार में सत्ता के दो केंद्र बने रहने की वजह से प्रधानमंत्री के अनिर्णय की स्थिति में रहने से देश को अपूर्णीय क्षति हुई है।
आज देश हर क्षेत्र में इसकी कीमत चुका रहा है। देश का प्रधानमंत्री केंद्रीय मंत्रिमंडल का प्रमुख होता है। वही तय करता हैकि उसके मंत्रिमंडल में कौन-कौन से लोग होंगे, परंतु यह विडंबना ही है कि डॉ. मनमोहन सिंह अपनी पसंद के मंत्रियों का भी चयन नहीं कर सकते थे। यही वजह है कि कई वरिष्ठ मंत्री उनकी अनदेखी तक करते रहे, परंतु यहां यह भी सवाल खड़ा होता है कि ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद प्रधानमंत्री अपने पद से क्यों चिपके रहे? उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रति निष्ठा दिखाने की बजाय अपने कर्त्तव्यों को तरजीह क्यों नहीं दी? यदि उन्होंने पद की गरिमा और कर्त्तव्यों के प्रति गंभीरता दिखाई होती तो देश की आज यह हालत नहीं हुई होती और न ही कांग्रेस आम चुनावों में रेस से बाहर खड़ी हुई प्रतीत होती।
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