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पुरस्कार लौटाने से क्या हासिल होगा

साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है, जो निर्वाचित लेखकों द्वारा संचालित होती है।

पुरस्कार लौटाने से क्या हासिल होगा
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इन दिनों देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकार साहित्य अकादमी द्वारा प्राप्त पुरस्कार समेत अन्य सम्मान लौटा रहे हैं। उनका ऐसा मानना हैकि मौजूदा समय में देश में धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है। वे यह भी कह रहे हैं कि इन दिनों कुछ ताकतें जीवन जीने की स्वतंत्रता पर हमला कर रही हैं। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार इन ताकतों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। विरोधस्वरूप अब तक दर्जन भर से अधिक साहित्यकार अकादमी को अपना सम्मान लौटा चुके हैं। साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है, जो निर्वाचित लेखकों द्वारा संचालित होती है। यह हर वर्ष देश की 24 भाषाओं में साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट लेखन करने वालों को पुरस्कृत करती है। ऐसे में प्रश्न खड़ा होता हैकि वे विरोध किसका कर रहे हैं जब सरकार की इसमें कोईभूमिका ही नहीं है। ऐसा कर वे लोग अपनी ही संस्था और अपने ही साथियों का एक तरह से अपमान कर रहे हैं। यदि इन साहित्यकारों को कन्नड़ लेखक एम कलबर्गी और बिसाहड़ा के अखलाक की निर्मम हत्या के आधार पर भारत की एकता और विविधता के खंड खंड होने का खतरा नजर आने लगा है तो अब प्रश्न उठता हैकि इससे पहले भी दंगे हुए हैं। सिख-संहार, बाबरी-विध्वंस व मेरठ-गुजरात आदि उदाहरण मौजूद हैं। तब इन्हें लोकतंत्र का मूल्य खतरे में नजर क्यों नहीं आया? उस समय ये सम्मान लौटाने के लिए आगे क्यों नहीं आए? इस समय सम्मान लौटा कर भले ही केंद्र की मोदी सरकार पर सैद्धांतिक व नौतिक दबाव बनाना चाहते हों, लेकिन देखा जाए तो कहीं न कहीं इसके पीछे राजनीति भी दिखाईदेती है क्योंकि कानून व्यवस्था राज्यों का मामला है। नागरिकों की सुरक्षा देने और अपराधियों की धरपकड़ व सजा दिलाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। ये साहित्यकार उनके खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं इसलिए भी इनकी मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोग तो इन साहित्यकारों पर एक खास विचारधारा से नजदीकी रखने व मौकापरस्त होने का आरोप लगा रहे हैं। जाहिर है, दबाव बनाने का यह तरीका उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। इसमें नकारात्मकता ज्यादा है। यदि हाल में हुई घटनाओं का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए और मृतक परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। हिंदी के प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और लेखिका मृदुला गर्ग ने भी कहा हैकि लेखकों को ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए। वे घटनाओं का विरोध करें अकादमी का नहीं क्योंकि वह राजनीतिक संस्था नहीं है। वह ऐसे मुद्दों पर हमेशा से चुप रही है। पुरस्कार लौटाया जाना सनसनीखेज खबर हो सकती पर विडंबना यह है कि कम लोग इस अकादमी को जानते हैं। यदि देश में भाईचारे का संदेश देना है या इन घटनाओं के खिलाफ आवाज बुलंद करनी है तो बेहतर है कि लेखक समाज एकजुट हो कर कोई रचनात्मक पहल करे या सड़क पर उतरे। समस्या यह हैकि इनमें ही एकजुट होकर सड़क पर उतरने का संकल्प नहीं दिखता है। ऐसे में पुरस्कार वापसी से उनका थोड़ा प्रचार हो जाएगा, उससे ज्यादा कुछ होने की उम्मीद कम है।
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