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कार्टून जगत से ‘आम आदमी’ का जाना, पांच दशक तक किया जनमानस की भावनाओं को रेखांकित

आरके लक्ष्मण का ‘आम आदमी’ मंगल पर पहुंच गया है।

कार्टून जगत से ‘आम आदमी’ का जाना, पांच दशक तक किया जनमानस की भावनाओं को रेखांकित
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मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, परंतु जब तक यह धरती रहेगी तब तक उनका ‘(दी कॉमन मैन) आम आदमी’ जिंदा रहेगा। दरअसल, ‘आम आदमी’ उनके कार्टून चरित्र का नाम है। उनके कार्टून का हर सुबह देश की जानीमानी हस्तियां इंतजार करती थीं। कहा जाता है कि जवाहर लाल नेहरू ने भी एक बार आरके लक्ष्मण के बारे में कहा था कि मैं जब तक लक्ष्मण का कार्टून नहीं देखता तब तक मेरी सुबह शुरू नहीं होती। हमारे देश को लक्ष्मण जैसे और कार्टूनिस्ट की जरूरत है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि देश ने एक महान कार्टूनिस्ट और सुबह की मुस्कुराहट को हमेशा के लिए खो दिया है। वहीं भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा है कि आरके लक्ष्मण का ‘आम आदमी’ मंगल पर पहुंच गया है। यहां उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपना अंतिम कार्टून इसरो के लिए ही बनाया था। उनका जन्म 1921 में मैसूर में हुआ था। बचपन से ही रेखाचित्र बनाने में माहिर थे। हालांकि मुंबई के प्रख्यात जेजे स्कूल आॅफ आर्ट में दाखिला नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने हौसला नहीं खोया। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत मुंबई के ‘दी फ्री प्रेस जर्नल’ से राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रूप में की। यहां उनकी दोस्ती बाल ठाकरे से हुई। बाद में वे टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े। इसी अखबार से उनकी कार्टून स्ट्रिप ‘यू सेड इट’ से उनको पहचान मिली। इसी स्ट्रिप में उन्होंने ‘आम आदमी’ के चरित्र को रेखांकित किया।

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आरके लक्ष्मण पांच दशक से भी अधिक समय तक अपने कार्टूनों के जरिए आम जनमानस की भावनाओं को रेखांकित करते रहे। वे देश की समस्याओं, लोकतंत्र के विकसित होते रूप, भ्रष्टाचार सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़े मुद्दों पर तीक्ष्ण कटाक्ष, व्यंग्य करते रहे। वे गंभीर से गंभीर मुद्दों पर सहजतापूर्वक सटीक व्यंग्य करने में माहिर थे। उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें रमन मैगसेसे पुरस्कार सहित पद्म विभूषण जैसे नागरिक सम्मान से नवाजा गया। कह सकते हैं कि उनके कार्टून में आम आदमी की ताकत थी। उनकी रेखाओं में साधारण आदमी के लिए मान सम्मान था, राजनीति के लिए व्यंग्यबाण था और जिंदगी के लिए मुस्कान थी। कार्टून की दुनिया में वे क्रांति लेकर आए थे। उनके आइडिया कमाल के होते थे। उनका कार्टून बनाने का आइडिया वो काम कर जाता था, जो बड़ी-बड़ी ब्रेकिंग स्टोरी नहीं कर पाती थी। स्वयं आरके लक्ष्मण ने कार्टून के बारे में कहा था कि कार्टून अनिवार्य रूप से असहमति और शिकायत की कला है।

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समस्त व्यक्तियों और विषयों को वह एक प्रकार की स्वस्थ और सद्भावपूर्ण खिल्ली की नजर से देखती है, द्वेष भावना से कभी नहीं। कार्टूनिस्ट अपने चित्रों में किसी राजनीतिक या सामाजिक मामले को चिंता करने लायक नहीं, हंसने लायक चीज के रूप में पेश करता है। इस प्रकार कार्टून प्रकृति की ओर से सूचना है कि चिजों को हल्के मन से लें, दुनिया में कुछ भी बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। देखा जाए तो आरके लक्ष्मण के कार्टून गंभीर मुद्दों और समस्याओं पर आम आदमी को क्षण भर के लिए हंसने का अवसर देते रहे तो सत्ताधारियों को उनको सुलझाने के लिए प्रेरणा देते रहे। उनके जाने पर यही कहा जा सकता है कि कार्टून की दुनिया का शहंशाह चला गया। अपने ‘आम आदमी’ चरित्र के जरिए वे सदियों तक याद आते रहेंगे।

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