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रसायन शास्त्र के क्षेत्र में क्रांतिकारी खोज

इंसानों में आनुवांशिक बीमारियों का कारण क्या है? कैंसर की कोशिकाओं का विकास और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया क्या है?

रसायन शास्त्र के क्षेत्र में क्रांतिकारी खोज

नई दिल्ली. इस साल रसायन शास्त्र के नोबेल पुरस्कार के लिए स्वीडन के टॉमस लिंडाल, अमेरिका के पॉल मॉडरिश और तुर्क-अमेरिकी वैज्ञानिक अजीज सैंकर को चुना गया है। टॉमस लिंडाल ने उस प्रोटीन की खोज की है जो कोशिकाओं की खराबी को ठीक करता है। अजीज सैंकर ने उस प्रक्रिया का पता लगाया है जिससे कोशिकाएं पराबैंगनी किरणों से होने वाले नुकसान को ठीक करती हैं। और पॉल मॉडरिश ने डीएनए को ठीक करने की उस जटिल प्रक्रिया का पता लगाया है जिसे बेमेल मरम्मत कहा जाता है। डिऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड को संक्षेप में डीएनए कहा जाता है।

इंसान समेत तकरीबन हर जीव की कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाया जाने वाला यह एक आनुवांशिक पदार्थ होता है। इसे जीवन के निर्माण और अस्तित्व का रासायनिक कोड माना जाता है। कई बार कड़ी धूप या अन्य पर्यावरणीय कारकों के कारण इसमें खराबी आ जाती है, लेकिन कोशिकाओं में एक प्रोटीन उनकी मरम्मत करने वाली किट की तरह काम करता है, जो क्षतिग्रस्त हुए डीएनए को ठीक कर देता है। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में कोशिकाओं द्वारा डीएनए की इसी मरम्मत प्रक्रिया के बारे में बताया है। इस खोज से इस बात का पता चला है कि जीवित कोशिकाएं किस तरह काम करती हैं? इंसानों में आनुवांशिक बीमारियों का कारण क्या है? कैंसर की कोशिकाओं का विकास और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया क्या है? इसमें कोई दो राय नहीं कि यह अध्ययन आने वाले दिनों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी साबित होगा।

इस शोध के आधार पर आगे न सिर्फ कैंसर जैसी घातक बीमारी के इलाज के नए तरीके को विकसित किया जा सकता है, बल्कि इस प्रश्न का जवाब भी खोजा जा सकता है कि हम बूढ़े कैसे होते हैं? डीएनए में बदलाव के कारण ही इंसान बीमार या बूढ़ा होता है। यही नहीं अब उन बीमारियों को भी ठीक करने में मदद मिल सकेगी जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों में समय के साथ उभर आती हैं क्योंकि इस खोज से कई वंशानुगत बीमारियों के बेहद सूक्ष्म कारणों के बारे में पता चला है। कैंसर कितनी घातक बीमारी है, यह बताने की जरूरत नहीं है। आज भी इसका कारगर इलाज नहीं खोजा जा सका है। यदि समय रहते इसका पता चल जाए तो ही किसी रोगी के बचने की संभावना रहती है अन्यथा थोड़ी सी देरी जानलेवा साबित हो जाती है। हर साल भारत में ही करीब नौ लाख लोग विभिन्न तरह के कैंसर से जूझते हुए दम तोड़ देते हैं। विश्व स्तर पर यह आंकड़ा और भी अधिक है। जिस तरह के वातावरण का निर्माण हम अपने आसपास करते जा रहे हैं, उसे देखते हुए इसमें कमी के बजाय तेज वृद्धि की आशंका है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि यह अध्ययन कैंसर से डरी दुनिया के हाथों एक कारगर हथियार मुहैया कराएगा।

गत दिनों परजीवी से होने वाले मलेरिया व फाइलेरिया जैसे संक्रामक रोगों से लड़ने में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए चीन की यूयू तू, आयरलैंड के विलियम सी कैंपबेल व जापान के सातोशी ओमूरा को चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया। मच्छरों से होने वाले मलेरिया से दुनिया भर में हर साल करीब 4.5 लाख लोगों की मौत हो जाती है। वहीं फाइलेरिया से 12 करोड़ लोग पीड़ित हैं। जाहिर है, इन वैज्ञानिकों की खोजें उन बीमारियों से लड़ने में मददगार हैं जो दुनिया में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती हैं।

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