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केंद्रीय जांच एजेंसी की साख का सवाल

सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा को अपने पद से रिटायर होने में दस दिन ही शेष बचे हैं।

केंद्रीय जांच एजेंसी की साख का सवाल

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्हा को अपने पद से रिटायर होने में दस दिन ही शेष बचे हैं, लेकिन उन्हें हाईप्रोफाइल 2जी घोटाले की जांच से हटा दिया गया है। अर्थात इस केस से जुड़ी फाइलें, जांच एजेंसी का मुखिया होने के बावजूद, उनके पास नहीं जाएंगी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। उन पर आरोप है कि वे जांच के दौरान 1.76 लाख करोड़ के 2जी घोटाले के आरोपियों से अपने घर पर बार-बार मिलते रहे और उनमें से कई को बचाने की कोशिश करते रहे हैं। इसकी जांच हो रही है, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि प्रथम दृष्टया आरोप सही लग रहे हैं और ऐसा लग रहा है कि जांच के मामले में सब कुछ ठीक नहीं है।

इस मामले में साक्ष्य के तौर पर याचिकाकर्ता एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन के प्रशांत भूषण ने कुछ हफ्ते पहले सुप्रीम कोर्ट को रंजीत सिन्हा के घर पर रखे गए एक एंट्री रजिस्टर सौंपा था। देखा जाए तो सीबीआई के इतिहास में यह पहला मौका है जब शीर्ष अदालत ने उसके प्रमुख को ही किसी मामले की जांच से अलग हटने को कहा है। सीबीआई के कई पूर्व निदेशकों ने उनके इस व्यवहार को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। जोगिंदर सिंह ने कहा है कि सीबीआई निदेशक का व्यवहार न सिर्फ स्वच्छ व पारदर्शी होना चाहिए बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। हर घटना के पीछे कोई न कोई वजह जरूर होती है और बिना आग के धुआं भी नहीं उठता। लिहाजा रंजीत सिन्हा शक के घेरे में हैं।

सीबीआई देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी है। लोगों के बीच इसकी प्रतिष्ठा है और इसकी जांच पर लोग भरोसा करते हैं, लेकिन रंजीत सिन्हा ने जिस तरह का आचरण पेश किया है उससे अंतत: सीबीआई की ही साख प्रभावित हुई है। इसे उचित नहीं माना जा सकता है कि घोटाले के आरोपियों और दूसरे संदिग्ध लोगों से जांचकर्ता खुलकर मिले। और इस संबंध में जब सवाल खड़े होने लगे तो यह तर्क दे कर मामले से पल्ला झाड़े कि इसमें गलत ही क्या है? माना कि उनका इस तरह मिलना गैरकानूनी नहीं है और किसी जांचकर्ता को मनाही भी नहीं है कि वह ऐसे लोगों से अपने घर पर नहीं मिल सकता जिनके मामलों की जांच वह कर रहा है, परंतु रंजीत सिन्हा के घर रखी गई विजिटर्स डायरी में उनकी आरोपियों के साथ मुलाकातों की दर्ज संख्या सामान्य नहीं है। इसमें उनके नाम बड़ी संख्या में हैं जिन पर 2जी घोटाले में संलिप्तता के आरोप हैं।

किसी मामले में अभियुक्त से मिलने की एक प्रक्रिया होती है, लेकिन रंजीत सिन्हा ने उस प्रक्रिया की अनदेखी की है। सीबीआई निदेशक ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी है कि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया है। ठीक है कि कोई व्यक्ति कितना भी ईमानदार क्यों न हो, अगर वह इस तरह का काम करता है, तो शक होना स्वाभाविक है कि कहीं कोई समझौता तो नहीं हुआ है? इसलिए रंजीत सिन्हा का यह व्यवहार पूरी तरह से गलत व अनुचित है। घोटाला पूर्व की यूपीए सरकार से जुड़ा है। इसका पूरा सच देश जानना चाहता है पर सच्चाई सामने तभी आएगी जब जांच निष्पक्ष होगी। लिहाजा मामले को कमजोर करने वालों को जांच प्रक्रिया से दूर रखना जरूरी है।

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