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सार्वजनिक परिवहन को जनसुलभ बनाना जरूरी

इस मुहिम का मकसद शहर को भारी ट्रैफिक से बचाना और लोगों में सार्वजनिक परिवहन के लिए जागरूकता लाना है।

सार्वजनिक परिवहन को जनसुलभ बनाना जरूरी
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बाइस सितंबर को दुनिया भर में वर्ल्ड कार फ्री डे के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन लोगों को अपनी कार की जगह सार्वजनिक और प्रदूषण न फैलाने वाले वाहनों का इस्तेमाल करने को प्रेरित किया जाता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र गुड़गांव के कुछ हिस्सों में भी मंगलवार को कार फ्री डे मनाया गया, जिसके तहत लोगों से कहा गया कि वे सुबह सात बजे से शाम के सात बजे तक अपनी गाड़ियां सड़कों पर न उतारें। लोगों को आवागमन में परेशानी न हो इसके लिए स्थानीय प्रशासन की ओर से बसों का इंतजाम किया गया था और जगह-जगह स्टॉपेज बनाए गए थे। इस मुहिम का मकसद शहर को भारी ट्रैफिक से बचाना और लोगों में सार्वजनिक परिवहन के लिए जागरूकता लाना है। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे प्रदूषण कम होगा। पिछले एक महीने से हैदराबाद के साइबराबाद इलाके में हर गुरुवार कार फ्री डे मनाया जा रहा है। इस मुहिम की वजह से पिछले चार हफ्तों में उस इलाके में लोगों को काफी राहत मिली है।

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बहरहाल, सरकार को खासकर शहरों में इस मुहिम को सफल बनाना है तो सबसे पहले उन समस्याओं की पड़ताल करनी होगी, जिसके कारण लोगों को अपनी कारों का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ता है। इसमें कोईदो राय नहीं कि हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था कई बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है। इसके पास न तो पर्याप्त बसें हैं और न ही उनका कोई निश्चित टाइम टेबल है। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के चौपट होने से निजी वाहनों को फलने-फूलने का मौका मिला है, जिनका यात्रियों की सुविधा से ज्यादा लेना-देना नहीं होता है। ऐसे हालात में कई यात्री बेवजह भटकने को विवश हो जाते हैं। इन सब कारणों से लोगों का सार्वजनिक परिवहन से भरोसा कम होता जा रहा है। ऐसे में जो लोग साधन संपन्न हैं वे इन परेशानियों से निजात पाने के लिए अपनी कारों को ज्यादा तवज्जो देते हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि हर रोज सड़कों पर निजी गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। अब उस हिसाब से सड़कें बढ़ने से रहीं, लिहाजा जाम की समस्या भयावह होती जा रही है।

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आज आलम यह है कि दिल्ली जैसे शहर में जहां एक घंटे में पहुंचना चाहिए, वहां दो घंटे का समय लग रहा है। इन सबकी वजह से ईंधन की खपत बढ़ी है जो अंतत: वायु प्रदूषण और पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने का कारण बन रही है। एक बस में करीब 60 लोग सफर करते हैं। जबकि सड़कों पर चलने वाली अस्सी फीसदी कारों में एक या दो लोग होते हैं। इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि यदि लोग कारों को छोड़ बसों का इस्तेमाल करने लगें तो सड़कें जाम से काफी हद तक मुक्त हो जाएंगी। ऐसा नहीं है कि सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग कठिन है। दुनिया के कईदेशों ने अपने यहां ऐसा सिस्टम विकसित किया है, जहां शहरों के अंदर लोग अपनी कारें कम प्रयोग करते हैं। जापान इसका उत्तम उदाहरण है। देश में तमिलनाडु ने इस दिशा में कुछ प्रगति की है, लेकिन बाकी राज्य अभी भी सार्वजनिक परिवहन को जनसुलभ बनाने में पीछे हैं। ऐसे में पहले हम अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करें तभी लोग इस मुहिम के प्रति आकर्षित होंगे।

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