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धूम्रपान के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी

धूम्रपान करने वालों के संपर्क में आने से भी प्रति वर्ष हजारों लोगों की मृत्यु हो जाती है।

धूम्रपान के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी
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धूम्रपान हर तरह से नुकसानदेह होता है। यह हमारे धन को ही नष्ट नहीं करता, वरन स्वास्थ और पहचान को भी बिगाड़ देता है। धूम्रपान करने वालों में देश का हर तबका शामिल है। देखा जाए तो यह लोगों के जीवन में इस कदर घुलमिल गया है कि सरकार द्वारा विभिन्न प्रयासों के बावजूद इससे पीछा छुड़ाना कठिन हो रहा है। यह स्थिति तब है जब दुनिया में सबसे ज्यादा मौत की एक वजह सिगरेट की लत भी है। इसकी वजह से होने वाली सांस संबंधी बीमारी, टीबी, हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर और खतरनाक व्याधियों के कारण विश्व में प्रति वर्ष लाखों लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त धूम्रपान करने वालों के संपर्क में आने से भी प्रति वर्ष हजारों लोगों की मृत्यु हो जाती है। धूम्रपान की बढ़ती प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय इसके खिलाफ कड़ा कानून लाने पर विचार कर रहा है। गत दिनों इस पर सुझाव देने के लिए एक पैनल बनाया गया था। पैनल ने अपने सुझावों में कहा हैकि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान को संज्ञेय अपराध बनाया जाय और इसके लिए जुर्माना दो सौ रुपये से बढ़ाकर बीस हजार रुपये किया जाय। अकसर देखा जाता है कि सिगरेट निर्माता पैकेट पर तस्वीरों वाली चेतावनी के संकेत छापने से बचते हैं या बहुत ही छोटे में छापते हैं। पैनल ने इसनियम का पालन न करने वाले निर्माताओं पर जुर्माना पांच हजार रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये करने, धूम्रपान करने की न्यूनतम आयु 18 से बढ़ाकर 25 करने और साथ ही सिगरेट की खुली बिक्री पर रोक लगाने का सुझाव भी दिया है। यदि केंद्र सरकार इन सुझावों को मान लेती है तो इसकी वजह से होने वाली कैंसर, दिल की बीमारियों और स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याओं से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी। धूम्रपान को हतोत्साहित करने का एक दूसरा तरीका यह भी हैकि इन पदार्थों पर टैक्स बढ़ाएं, जिससे वे महंगे हो जाएंगे। बीते महीने पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आॅफ इंडिया द्वारा जारी इकोनॉमिक बर्डेन आॅफ टूबैको रिलेटेड डिजीज इन इंडिया नामक अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि यदि टैक्स बढ़ाने से सिगरेट आदि तम्बाकू उत्पादों की कीमतों में दस फीसदी की वृद्धि होती है, तो इनके सेवन में करीब 4-5 फीसदी की गिरावट आएगी। हालांकि समाज का एक वर्ग यह भी तर्क देता है कि जब सरकारें इसके खतरों को बखूबी जानती हैं तब देश भर में इसके उत्पादन और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती हैं? कुछ लोगों का आरोप है कि इससे होने वाले भारी राजस्व के चलते इस तरह के कदम उठाने से सरकारें बचती हैं। कुछ राज्यों में इसके वितरण पर प्रतिबंध जरूर है पर वहां भी इसकी खुलेआम ब्रिकी देखी जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि सरकार को इनसे जितना राजस्व मिलता है उससे ज्यादा इनके चलते पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज और नियंत्रण के उपायों पर खर्च हो जाता है। वर्ष 2011 में 35-69 आयु वर्ग के लोगों में सिगरेट आदि तम्बाकू जनित बीमारियों के कारण देश को करीब एक लाख करोड़ रुपये का बोझ उठाना पड़ा। यह राशि भारत की जीडीपी के करीब 1.16 फीसदी के बराबर बैठती है। कुल मिलाकर बड़ी संख्या में मृत्यु के लिए जिम्मेदार सिगरेट का सेवन पूरी तरह तभी रुकेगा जब समाज में इसके खिलाफ माहौल बनाया जाए। इसलिए जरूरी है कि इसके सेवन के खिलाफ कड़ा कानून बनाने के साथ-साथ हर स्तर पर लगातार प्रचार होता रहे, मुहिम चलती रहे।

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