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चुनाव नतीजों ने बढ़ाई ओबामा की मुश्किल

स्पष्ट है कि इससे सिर्फ अमेरिका ही प्रभावित नहीं होगा, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर होगा।

चुनाव नतीजों ने बढ़ाई ओबामा की मुश्किल

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के नतीजे राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं। उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी रिपब्लिकन ऊपरी सदन सीनेट में भी अब बहुमत में आ गई है। जबकि निचले सदन प्रतिनिधि सभा में वह पहले से ही बहुमत में है। जानकार इस चुनाव को पहले से ही राष्ट्रपति ओबामा और उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कामकाज पर जनमत सर्वेक्षण करार दे रहे थे। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हैकि अमेरिकी मतदाताओं ने उनकी नीतियों को नकार दिया है।

दरअसल, बीते कुछ समय से ही इस तरह के संकेत मिलने लगे थे। वहीं चुनाव पूर्व हुए कई सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई थी कि लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता कम हो रही है। इससे डेमोक्रेट उम्मीदवार इतने घबरा गए थे कि उन्होंने ओबामा को चुनावों से दूर रहने का अनुरोध तक कर डाला था। इस प्रकार देखा जाए तो बाकी बचे दो साल का उनका कार्यकाल कठिनाई में ही बीतने वाला है। क्योंकि दोनों सदनों में उनकी सरकार बहुमत में नहीं है और ऐसे में यदि विपक्ष ने उनका साथ नहीं दिया तो वे कोई बड़ा फैसला भी नहीं कर पाएंगे।

स्पष्ट है कि इससे सिर्फ अमेरिका ही प्रभावित नहीं होगा, बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर होगा। आईएसआईएस को लेकर जिस तरह से उन्होंने फैसले लेने में देरी की उसके लिए उनकी खूब आलोचना हुई थी। साथ ही उन पर इस बात के भी आरोप लगे हैं कि उन्होंने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उचित उपाय नहीं किए। ओबामा सरकार एक तरफ पश्चिम एशिया में आतंकवादियों के बढ़ते प्रभाव का सामना कर रही है वहीं दक्षिण अफ्रीका से फैली इबोला भी उनके समक्ष चुनौती पेश कर रही है। इसके साथ ही अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भी वह जूझ रही है। ओबामा ने कुछ अहम फैसले लिए हैं जिनका असर दिखने लगा है। अमेरिका मंदी के दौर से बाहर आ रहा है।

हालांकि रिपब्लिकन का अर्थव्यवस्था को लेकर उनके साथ कुछ नीतिगत मतभेद हैं। ओबामा अभी सरकारी प्रोत्साहन जारी रखना चाहते हैं। जाहिर है, यदि इस मुद्दे पर रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक में असहमति सतह पर आई तो अमेरिका सहित विश्व अर्थव्यवस्था भी उसके प्रभाव से बच नहीं सकेगी। वहीं अब विदेश नीति के मुद्दे पर भी दोनों में सहमति बनानी होगी। क्योंकि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। जवान जब वापस आ जाएंगे तो उसके बाद की स्थितियों से निपटने के लिए क्या तैयारी हो इस पर ओबामा को रिपब्लिकन के सहयोग की जरूरत होगी।

वहीं अब पाकिस्तान को लेकर अमेरिका को अपना रुख साफ करना होगा, क्योंकि खुद उसी के रक्षा विभाग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान भारतीय सेना का मुकाबला करने के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल कर रहा है। वहीं वह अफगानिस्तान में भी अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इन आतंकियों की मदद ले रहा है। उसके जमीन से संचालित आतंकवाद से स्वयं अमेरिका को भी खतरा है। उधर जबसे यूक्रेन विवाद के कारण अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं तबसे कई यूरोपीय देश भी उससे खासे नाराज हैं। अब तक विदेश नीति पर रिपब्लिकन ने ओबामा का साथ दिया है पर अभी उसकी निगाहें आगामी राष्ट्रपति के चुनाव पर टिकी होंगी। ऐसे में वह ओबामा की लोकप्रियता को और कम करने के लिए उनको घेरने की कोशिश करेगी। ओबामा इन चुनौतियों से कैसे पार पाते हैं, देखना दिलचस्प होगा।

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