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महाराष्ट्र की राजनीतिक घटना के निहितार्थ

1989 में शिवसेना के बाल ठाकरे और भाजपा के प्रमोद महाजन के बीच हुई बातचीत के बाद यह गठबंधन बना था।

महाराष्ट्र की राजनीतिक घटना के निहितार्थ
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महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का 25 वर्षों का गठबंधन टूट गया है। इसके साथ ही कांग्रेस-राकांपा का 15 सालों कासाथ भी छूट चुका है। विधानसभा चुनाव के कुछ ही हफ्ते पहले सीटों के बंटवारे को लेकर दो बड़े गठबंधन में हुए इस बिखराव को साल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना माना जा सकता है। 1989 में शिवसेना के बाल ठाकरे और भाजपा के प्रमोद महाजन के बीच हुई बातचीत के बाद यह गठबंधन बना था। दोनों दलों ने मिलकर 1995 में विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता भी। तब शिवसेना के सदस्य ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उसके बाद से कई बार राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनाव दोनों मिलकर ही लड़े। 2014 के लोकसभा चुनावों में दोनों के गठबंधन ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। भाजपा को जहां 48 में से 23 सीटों पर जीत मिली, वहीं शिवसेना को 18 पर। दूसरी ओर 1999 में शरद पवार ने कांग्रेस से अलग हो कर राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का गठन किया। उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और राकांपा गठबंधन भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सत्ता से बाहर करने में सफल रहा। तभी से दोनों का साथ बना हुआ था। सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। सीटों को लेकर थोड़े बहुत मतभेद थे, परंतु गठबंधन टूट जाएंगे ऐसा अनुमान नहीं था। ऐसा क्या हुआ कि चारों पार्टियों ने अपनी राह अलग कर ली। वह भी तब जब महाराष्ट्र में कांग्रेस के खिलाफ हवा बह रही है। दरअसल, इन गठबंधनों के टूटने की एक वजह दलों की अपनी लोकप्रियता को लेकर हुई गलतफहमी भी है। चारों दल अपना विस्तार करना चाहते हैं। महाराष्ट्र एक महत्वपूर्ण राज्य है। मुंबई को आर्थिक राजधानी कहा जाता है। ऐसे शहर अहम होते हैं। सभी चाहते हैं कि उनकी यहां सत्ता हो। एक दौर में भाजपा ने शिवसेना का मुख्यमंत्री बनवाया था, परंतु आज हालात बदल चुके हैं। भाजपा शिवसेना के मुकाबले बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इसे शिवसेना हजम नहीं कर पा रही थी। वह भाजपा नेतृत्व पर बार-बार दबाव डाल रही थी कि दिल्ली की सत्ता आप संभालिए और महाराष्ट्र हमें दे दीजिए। अर्थात विधानसभा चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री शिवसेना का होना चाहिए। जबकि भाजपा का कहना था कि मुख्यमंत्री उसी का होना चाहिए जो चुनाव में ज्यादा सीटें जीतेगा। बदली परिस्थितियों में भाजपा भी अपना आधार बढ़ाना चाह रही है, इसके लिए वह शिवसेना से अधिक सीटों की मांग कर रही थी। कांग्रेस- राकांपा गठबंधन के टूटने की भी यही वजह है। लोकसभा चुनावों में राकांपा ने कांग्रेस से ज्यादा सीटें जीती है, लिहाजा वह अधिक सीटों की मांग कर रही थी। यह मांग जायज भी प्रतीत हो रही थी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि गठबंधन के अगर फायदे थे, तो टूटने के नुकसान भी होंगे। भाजपा के साथ शिवसेना मजबूत स्थिति में थी जो अब नहीं रहेगी। ऐसे में उसे चुनाव में कितनी सफलता मिलेगी, यह अभी बताना मुश्किल है। अब चुनाव नतीजों के बाद पता चल जाएगा कि महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा लोकप्रिय कौन है। देश में नरेंद्र मोदी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है, परंतु महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में यह पार्टी के लिए लाभकारी साबित होगा कि नहीं यह भी बड़ा प्रश्न है?

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