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महाराष्ट्र में सीट बंटवारे पर महाभारत ठीक नहीं

दोनों ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस सीट बंटवारे में सम्मानजनक संख्या चाहती हैं।

महाराष्ट्र में सीट बंटवारे पर महाभारत ठीक नहीं
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महाराष्ट्र में 20 सितंबर से ही नामंकन दाखिल करने की प्रकिया शुरू है, जोकि 27 सितंबर तक चलेगी। लेकिन इस चुनाव में भाग लेने वाली प्रमुख पार्टियां भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के बीच सीट बंटवारे को लेकर महाभारत जारी है। दोनों ही गठबंधन न ही सीटों पर फैसला कर सके हैं और न ही उम्मीदवारों के बारे में। अधिक से अधिक सीटें झटकने के लिए शिवसेना और एनसीपी घमासान मचाई हुई हैं, जबकि दोनों ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां भाजपा और कांग्रेस सीट बंटवारे में सम्मानजनक संख्या चाहती हैं। 25 साल पुराना भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे सीटों की संख्या को लेकर इस कदर तल्ख हैं कि वे भाजपा को जरा भी स्पेस देने को तैयारी नहीं दिख रहे हैं। उन्होंने सीट बंटवारे पर भाजपा को जो फार्मूला (शिवसेना 151, भाजपा 119 और अन्य 18 ) दिया है, उसमें भाजपा के लिए 2009 की तरह ही 119 सीटें हैं। 2009 में शिवसेना ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालांकि उस चुनाव में शिवसेना से अधिक भाजपा को सीटें मिली थीं। शिवसेना को 44 व भाजपा को 46। अब जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद राजनीतिक स्थितियां बदल चुकी हैं। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत एनडीए की सरकार है और देश में मोदी के प्रति बड़ा जनसमर्थन है। लोकसभा चुनाव में शिवसेना से अधिक वोट भाजपा को मिले थे। भाजपा को इसका लाभ इस विस चुनाव में भी मिलने की आशा है। शायद शिवसेना इस हालात को कबूलने को तैयार नहीं दिख रही है। इस फार्मूले के साथ ही शिवेसना प्रमुख उद्धव ठाकरे भाजपा पर नैतिक, भावनात्मक और अकेले लड़ने की धमकी देकर दबाव बनाने की कोशिश भी की है। उद्धव का यह कहना कि शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने मोदी का समर्थन किया था, हमारा भाजपा से पुराना रिश्ता है, हमने बहुत दिन देखे हैं और भाजपा अगर नहीं मानती है तो हमारे शेर अकेले लड़ने को तैयार हैं, दबाव के ही संकेत हैं। हालांकि भाजपा ने इसे नकार दिया है और उसने शिवसेना को अपना फार्मूला दिया है जिसमें भाजपा 130, शिवसेना 140 और अन्य को 18 सीटें देने की बात है। भाजपा ने अपनी तरफ से कहा है कि हम वैसी सीटें चाहते हैं जहां शिवसेना 25 सालों से हारती आई है। इसी तरह एनसीपी कांग्रेस से बराबर सीटें चाहती है। एनसीपी ने कांग्रेस से कहा है कि उन्हें 144 सीटों से कम मंजूर नहीं है। 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में 2009 में कांग्रेस 170 सीटों व एनसीपी 113 सीटों पर लड़ी थीं। कांग्रेस को 82 व एनसीपी को 62 सीटों पर विजय मिली थी। इस बार केंद्र में कांग्रेस की करारी हार के बाद एनसीपी उस पर दबाव बनाना चाहती है और अपने खाते में अधिक सीटें झटकने की कोशिश कर रही है। अहम सवाल यह है अब चुनाव के इस मोड़ पर गठबंधनों के बीच सीटों को लेकर इस तरह की झिकझिक ठीक नहीं है। दोनों ही गठबंधन आखिर वोटरों को क्या संदेश देना चाहते हैं। उम्मीदवारों को भी तैयारी का कम समय मिलेगा। सीटों पर समझौता समय रहते ही क्यों नहीं कर लिया गया?

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