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द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश

जुलाई 2014 के बाद मोदी और जिनपिंग के बीच यह तीसरी मुलाकात है।

द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में जिस तरह का स्वागत हुआ है उससे इस बात की उम्मीद बढ़ गई है कि उनकी यह तीन दिवसीय यात्रा द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने वाली साबित होगी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रोटोकॉल तोड़कर पहली बार राजधानी बीजिंग के बाहर अपने गृहनगर शियान में किसी विदेशी मेहमान के स्वागत के लिए पहुंचे, इससे भी इस दौरे की अहमियता समझी जा सकती है।
जुलाई 2014 के बाद मोदी और जिनपिंग के बीच यह तीसरी मुलाकात है। यात्रा से पहले चीनी मीडिया को दिए इंटरव्यू में भारतीय प्रधानमंत्री कह भी चुके हैं कि चीन के उनके इस दौरे से केवल चीन-भारत दोस्ती ही प्रगाढ़ नहीं होगी बल्कि यह एशिया में विकासशील देशों के साथ ही दुनिया भर में संबंधों के लिए मील का पत्थर साबित होगा। चीन दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी मंगोलिया और दक्षिण कोरिया भी जाएंगे। हालांकि चीन के साथ आधिकारिक समझौते की तस्वीर शुक्रवार को वहां के प्रधानमंत्री ली कचियांग के साथ होने वाली वार्ता के बाद ही साफ हो सकेगी। बहरहाल, उससे पहले शी जिनपिंग के साथ उनकी सीमा विवाद, सामरिक, आर्थिक, प्राकृतिक आपदा और आतंकवाद के मुद्दे पर बातचीत हुई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने जहां अरुणाचल प्रदेश में नत्थी वीजा का मामला उठाया वहीं चीन द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किए जाने वाले निवेश पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने भारत-चीन के बीच लगातार बढ़ते व्यापार घाटे और भारत में चीनी निवेश पर भी चिंता जताई। साथ ही संयुक्त राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और परमाणु आपूर्ति समूह में भारत का समर्थन करने की भी मांग की। हालांकि चीन ने साफ किया है कि सीमा विवाद पर इतनी जल्दी नतीजे की उम्मीद बेमानी है। उसे हल करने में समय लगेगा। भारत भी जटिलता को देखते हुए इसको शांतिपूर्वक बातचीत के जरिए ही हल करने का इच्छुक है। इस बीच दोनों देश आर्थिक, सामरिक, पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। यही वजह है कि व्यापार और निवेश के एजेंडे को सबसे ऊपर रखा गया है। आज भारत-चीन के बीच करीब 70 अरब डॉलर का व्यापार होता है, जो आठ फीसदी की दर से लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह चीन के पक्ष में झुका है। यानी भारत चीन को जितना निर्यात करता है, उससे कईगुना अधिक चीन भारत को निर्यात करता है।
इससे भारत को करीब 48 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उठाना पड़ता है। दरअसल, चीन ने भारत द्वारा कृषि, फार्मा और आईटी आदि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा रखी है। भारत की मांग है कि वह इन उत्पादों के लिए भी अपने बाजार खोले तभी व्यापार में संतुलन आएगा। यदि चीन आर्थिक संबंधों को आगे ले जाना चाहता है तो उसे इन मांगों पर गौर करना चाहिए। वहीं चीन से भारत में होने वाला निवेश भी एक बड़ा मुद्दा है। आज मोदी सरकार देश में जिस तरह के विनिर्माण और ढांचागत विकास करना चाहती है, उसमें चीनी निवेश की काफी जरूरत है।
इस यात्रा के दौरान हाईस्पीड ट्रेन और स्मार्ट सिटी सहित करोड़ों रुपए के मूल्य के कई समझौते होने हैं। पिछले साल शी जिनपिंग जब भारत दौरे पर आए थे तब विभिन्न क्षेत्रों में 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। इन समझौतों को जल्द से जल्द जमीन पर उतारने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की व्यक्तिगत केमिस्ट्री को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि इन मुद्दों पर भारत को चीन का सकारात्मक सहयोग मिलेगा।
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