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रिश्तों को नई ऊंचाई दे गया जापान दौरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पांच दिवसीय जापान दौरा दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई दे गया।

रिश्तों को नई ऊंचाई दे गया जापान दौरा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पांच दिवसीय जापान दौरा दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई दे गया। जापान से मिले सकारात्मक सहयोग और विश्वास बहाली से खुश प्रधानमंत्री मोदी ने जहां इसे बेहद सफल माना है, वहीं जापानी प्रधानमंत्री शिजां एबे ने इसे ऐतिहासिक करार दिया है। यह यात्रा इसलिए भी याद रखी जाएगी कि भारत-जापान के बीच भरोसे की डोर और मजबूत हुई है। नरेंद्र मोदी के शब्दों में कहें तो इस भरोसे से दोनों के रिश्तों को फेविकोल से भी ज्यादा मजबूती मिली है। शायद यही वजह रही कि जापान मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी योजनाओं, चाहे बुलेट ट्रेन चलाने की योजना हो, वाराणसी को क्योटो शहर के तर्ज पर विकसित करना हो, सौ स्मार्ट शहरों का निर्माण हो, गंगा नदी का पुनरुद्धार हो या फिर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन हो, में खुलकर सहयोग देने पर सहमत हुआ है। हालांकि इस दौरे में नागरिक परमाणु समझौता नहीं हो सका, परंतु दोनों देश इसे जल्दी ही पूरा करने पर एकमत हुए हैं। यंू तो, भारत-जापान के संबंध बहुत पुराने हैं। फिर भी दोनों के व्यापारिक और आर्थिक संबंध बहुत आगे नहीं बढ़ पाए हैं। वर्ष 2013-14 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 16.39 बिलियन डॉलर रहा। यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का दो फीसदी है, जबकि जापान का सिर्फ एक फीसदी। विदेशी निवेश के मामले में तो भारत जापान की सूची में हमेशा से बहुत नीचे रहा है। वर्ष 2000 से फरवरी 2014 तक जापानी कंपनियोंं ने भारत में 15.97 बिलियन डॉलर निवेश किए। इस दौरान भारत में हुए कुल विदेशी निवेश का यह सिर्फ आठ फीसदी ही है। ये आंकड़े एशिया की दूसरी और तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के बीच आर्थिक संबंधों की तस्वीर पेश कर रहे हैं। परंतु नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद हालात बदलने की पूरी संभावना बनती दिखाई दे रही है। जापान ने कहा है कि वह भारत में अगले पांच वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा और स्मार्ट शहरों से जुड़ी परियोजनाओं में 3.5 ट्रिलियन येन अर्थात 33.5 बिलियन डॉलर निवेश करेगा। 90 के दशक में जब भारत में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ, तो जापानी कंपनियों और निवेशकों में यहां कारोबार करने को लेकर भारी उत्साह था। परंतु यहां व्याप्त लालफीताशाही और लंबी कागजी प्रक्रियाओं ने उनके उत्साह को धीरे-धीरे समाप्त कर दिए। नरेंद्र मोदी इन समस्याओं से पूरी तरह वाकिफ हैं। यही वजह है कि उन्होंने जापानी निवेशकों के लिए भारत में रेड टेप नहीं, रेड कार्पेट बिछाने का वादा किया है। साथ ही उनको निवेश में मदद के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में एक विशेष टीम जापान प्लस गठित करने का भी वादा किया है। मौजूदा समय में चीन में उत्पादन लागत बढ़ रही है और चीन-जापान के बीच राजनीतिक विवाद भी बना हुआ है, ऐसे में जापान के कारोबारी भारत की ओर देख रहे हैं। लिहाजा मोदी का यह मंत्र कारगर साबित हो सकता है कि व्यापार के लिए थ्रीडी-डेमोके्रसी, डेमोग्राफी और डिमांड की जरूरत होती है, जो कि सिर्फ भारत में ही मौजूदा है। एक तरह से प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया को संदेश दिया है कि कम मेक इन इंडिया। अब मोदी सरकार की बारी है कि वह निवेश प्रक्रियाओं को कैसे आसान बनाती है। कुल मिलाकर, अब जापान के भरोसे को कायम रखने की जिम्मेदारी हमारी है।
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