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विवादित मुद्दों को परे रख भरोसा बहाली की कोशिश

चीन ने भारत द्वारा कृषि, फार्मा और आईटी आदि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा रखी है।

विवादित मुद्दों को परे रख भरोसा बहाली की कोशिश
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के बीच शुक्रवार को हुई द्विपक्षीय वार्ताको दोनों देशों के रिश्तों की मजबूत नींव रखने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है। दोनों देश छोटे छोटे कदमों से बड़ी दूरी तय करने की दिशा में बढ़ते प्रतीत हो रहे हैं। बड़े मुद्दों पर अभी कोई समझौता नहीं हुआ है, उसके बावजूद पहले राष्ट्रपति शी जिनपिंग और फिर प्रधानमंत्री ली के साथ उनकी हुई बातचीत के बिंदुओं पर नजर डालें तो काफी सकारात्मक संदेश मिल रहे हैं।
दोनों देशों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विवाद के मुद्दों को ज्यादा महत्व न देते हुए व्यापार और दूसरे क्षेत्रों में साथ-साथ आगे बढ़ने की प्रतिबद्धता दिखाई है। दोनों देश आर्थिक, सामरिक, पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। जानकारों का भी मानना है कि एक बार दोनों मुल्कों के बीच भरोसा कायम हो जाए तो फिर विवादों को भी आसानी से सुलझाया जा सकता है। दस अरब डॉलर मूल्य के जिन 24 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं वे भारत-चीन को और नजदीक लाएंगे। इसके अलावा ली केकियांग के साथ उनकी सीमा विवाद और आतंकवाद के मुद्दे पर भी बातचीत हुई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने जहां अरुणाचल प्रदेश में नत्थी वीजा का मामला उठाया वहीं चीन द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किए जाने वाले निवेश पर भी आपत्ति जताई। हालांकि सीमा विवाद पर इतनी जल्दी नतीजे की उम्मीद बेमानी है। उसे हल करने में समय लगेगा। भारत भी जटिलता को देखते हुए इसको शांतिपूर्वक बातचीत के जरिए ही हल करने का इच्छुक है। यही वजह है कि व्यापार और निवेश के एजेंडे को सबसे ऊपर रखा गया। आज भारत-चीन के बीच करीब 70 अरब डॉलर का व्यापार होता है, जो आठ फीसदी की दर से लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह चीन के पक्ष में झुका है। यानी भारत चीन को जितना निर्यात करता है, उससे कई गुना अधिक चीन भारत को निर्यात करता है। इससे भारत को करीब 48 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उठाना पड़ता है।
दरअसल, चीन ने भारत द्वारा कृषि, फार्मा और आईटी आदि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा रखी है। भारत की मांग है कि वह इन उत्पादों के लिए भी अपने बाजार खोले तभी व्यापार में संतुलन आएगा और भारत को कारोबार का लाभ मिल पाएगा। आज देश में विनिर्माण और ढांचागत विकास के लिए भी चीनी निवेश की काफी जरूरत है। भारत उससे निवेश बढ़ाने की मांग कर रहा है। द्विपक्षीय वार्ता में लगातार बढ़ते व्यापार घाटे और चीनी निवेश के मसले पर भारत की चिंता को तवज्जो मिली है। इसके सार्थक हल के लिए हाई लेवल टास्क फोर्स के गठन का फैसला किया गया है। इसके नतीजे भारत के पक्ष में आने की उम्मीद है।
वहीं शनिवार को शंघाई में प्रधानमंत्री की व्यापार जगत के लोगों के साथ बैठक होगी, जहां भारत में होने वाले निवेश व मेक इन इंडिया में सहयोग पर फैसले होंगे। भारत को ज्यादा से ज्यादा निवेश मिलने की उम्मीद है क्योंकि यह दुनिया का सबसे तेज गति से विकास करने वाला देश है। यहां कारोबार के लिए जरूरी आबादी, मांग और लोकतंत्र एक साथ मौजूद हैं। नरेंद्र मोदी को चीन में जैसा सम्मान मिला है उससे कहा जा सकता हैकि दोनों देश पुरानी कड़वाहटों को भूलाकर सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ने को प्रतिबद्ध हैं।
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