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अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ब्रिक्स की भूमिका

2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले इसे ब्रिक के नाम से जाना जाता था।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ब्रिक्स की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स देशों के छठवें शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए ब्राजील की यात्रा पर हैं। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से मिलकर बने इस समूह के नेता जब फोतार्लेजा और ब्राजीलिया में 14 और 15 जुलाई को शिखर बैठक में शिकरत करेंगे तो दुनिया की नजरें उन पर टिकी होंगी। पिछले वर्ष डरबन में लिए गए फैसलों के आगे की कार्रवाई के रूप में ब्रिक्स की शिखर बैठक हो रही है। इस सम्मेलन में फोतार्लेजा घोषणापत्र जारी किए जाने की भी संभावना है। जिसमें कईमहत्वपूर्ण समझौतों का उल्लेख हो सकता है। सौ बिलियन डॉलर के आपात संरक्षण कोष की शुरुआत हो सकती है। वहीं एक नए डेवलपमेंट बैंक का खाका भी सामने आ सकता है।
पिछली बार डरबन में इस पर काफी चर्चा हुई थी परंतु सदस्य देशों के बीच कुछ मतभेद के कारण यह सिरे नहीं चढ़ पाया था। अर्थात प्रत्येक सदस्य राष्ट्र का योगदान कितना रहेगा और इसका मुख्यालय कहां स्थित होगा, शंघाई में या नई दिल्ली में। माना जा रहा हैकि ब्रिक्स देशों के बीच इस पर एक व्यापक सहमति बन गई है। लिहाजा इस बार कोई नतीजा सामने आ सकता है। डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स के सदस्य देशों तथा अन्य विकासशील देशों को रियायती ऋण देगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह समझौता साकार होने के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बदल जाएगा। वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार सहित विश्व बैंक तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं में भी सुधार की आवाज उठने की उम्मीद है। वैसे भी इन तीनों संस्थाओं में लंबे समय से सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। विकसित देशों से इतर अब विकासशील देश भी इनमें अपनी व्यापक भूमिका देख रहे हैं। ब्रिक्स की पहली बैठक 2009 में हुई थी।
2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल किए जाने से पहले इसे ब्रिक के नाम से जाना जाता था। रूस को छोड़कर ब्रिक्स के सभी सदस्य विकासशील या नव औद्योगीकृत देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। ये राष्ट्र क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। ब्रिक्स विश्व के कुल भू-भाग में एक-चौथाई से अधिक की हिस्सेदारी रखता है, आबादी में इसकी भागीदारी 40 फीसदी और इसका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 24 खरब डॉलर का है। इस प्रकार देखें तो अंतरराष्ट्रीय जगत में यह एक सशक्त और मजबूत मंच के रूप में उभर रहा है।
इसे विकसित देश नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह समूह क्षेत्रीय संतुलन, विश्व में शांति और स्थिरता का माहौल तैयार करने में बड़ा योगदान दे सकता है। वहीं किसी बहुपक्षीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का नरेंद्र मोदी के पास यह पहला मौका होगा। इस अवसर पर मोदी चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, रूस के राष्ट्रपतियों के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे। इसके अलावा वे दक्षिण अमेरिकी देशों के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की मुलाकात से इन देशों के साथ पहले से ही घनिष्ठ द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी और यह इन संबंधों को अधिक मजबूत बनाने का अवसर प्रदान करेगा।
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