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चिंतन: दुर्घटना पीड़ितों की मदद बेखौफ कर सकेंगे लोग

सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को अगर तुरंत इलाज मिल जाए तो हर साल हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।

चिंतन: दुर्घटना पीड़ितों की मदद बेखौफ कर सकेंगे लोग

सड़क पर दुर्घटना के शिकार को तुरंत मदद मुहैया कराने वाले नेक दिल के लोगों को कानूनी तौर पर सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सुप्रीम कोर्ट ने सराहनीय कदम उठाया है। दरअसल, सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ित लोगों की मदद करने वालों को पुलिस या किसी अन्य अधिकारी द्वारा बेवजह परेशान किए जाने से बचाने के लिए केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है। इस मंजूरी की इसलिए जरूरत थी, क्योंकि अभी केंद्र सरकार ने इस बारे में कानून नहीं बनाया है। इसमें समय लगेगा। तब तक के लिए केंद्र ने सभी सरकारों (केंद्र, राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों) के लिए दिशानिर्देश जारी किया, जिसे शीर्ष अदालत की मंजूरी मिल जाने से सभी सरकारों के लिए इस पर अमल करना आसान हो जाएगा। चूंकि ट्रैफिक नियंत्रण और सड़क संचालन में पुलिस का दखल है, जो कि राज्यों के कानूनों से संचालित है।

इसलिए केंद्र की गाइडलाइन्स को सर्वोच्च अदालत के वैधानिक सर्मथन के बाद अब लोग निडर होकर लोगों की मदद करने को आगे आएंगे। अभी होता यह है कि सड़क पर दुर्घटना के पीड़ितों को अस्पताल पहुंचाने से लोग हिचकते हैं। वे मदद करना भी चाहते हैं तो पुलिसिया पूछताछ के डर से ऐसा नहीं करते। शंका बनी रहती है कि पुलिस बार-बार थाने बुलाकर मानसिक उत्पीड़न करेगी। इस वजह से लोग दुर्घटना स्थल से कन्नी काट लेते हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक सड़क दुर्घटना के शिकार लोगों को अगर तुरंत इलाज मिल जाए तो हर साल हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।

मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक रोड एक्सीडेंट से हर साल सवा से डेढ़ लाख लोगों की मौत हो जाती है, करीब चार लाख लोग स्थाई रूप से अपंग होकर बेकार जाते हैं। मेट्रो सिटी में रोड एक्सीडेंट की दर बहुत ज्यादा है। नेशनल हाईवे पर भी दुर्घटना की दर बढ़ रही है। खासकर शराब पीकर नशे में गाड़ी चलाने, रैश ड्राइविंग, ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करने जैसे कारणों के चलते सड़क दुर्घटनाएं ज्यादा हो रही हैं।

चिंता की बात यह है कि इन दुर्घटनाओं में ज्यादातर कामकाजी लोग मरते हैं, जो अपने परिवार का सहारा होते हैं। ऐसी मौतों से पूरा परिवार ही बेसहारा हो जाता है, वह आर्थिक संकट में फंस जाता है। न्यायाधीश वी गोपाला गौड़ा और न्यायाधीश अरुण मिर्शा की पीठ ने केंद्र सरकार से इन दिशानिर्देशों का व्यापक प्रचार करने के लिए भी कहा, ताकि मुसीबत के समय दूसरों की मदद करने वाले नेक लोगों को कोई अधिकारी प्रताड़ित न कर पाए।

ये दिशानिर्देश पूर्व न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति की सिफारिशों पर आधारित थे। इस समिति ने अपनी सिफारिशों में वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए जा रहे कदमों की निगरानी के लिए गठित कमेटी के सुझावों को भी शामिल किया है। सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने मिलकर सड़क सुरक्षा की दिशा में जो कदम उठाया है, उससे निश्चित ही सड़क दुर्घटना के चलते होने वाली मौतों में कमी आएगी और रोड पर मददगारों की संख्या भी बढ़ेगी।

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