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चिंतन: ''जेएनयू'' मामले पर कोर्ट परिसर में झड़प चिंतनीय

हमारी अदालत का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है और कई ऐतिहासिक फैसले देकर उसने लोकतंत्र की रक्षा भी की है और कानून की व्याख्या भी की है।

चिंतन:
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जेएनयू 'देशद्रोह' आरोप प्रकरण को लेकर नई दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट परिसर के अंदर और बाहर जो कुछ भी हुआ, उसे किसी भी लोकतंत्रिक व स्वतंत्र न्याय व्यवस्था में जायज नहीं ठहराया जा सकता है। लोकतंत्र में संवैधानिक व कानूनी दायरे में सबको अपना पक्ष रखने का अधिकार है। अगर किसी ने कोई अपराध किया है, तो उसे सजा देने के लिए अदालत है। आरोपी पर अपराध तय करने के लिए कानून की धाराएं हैं और पुलिस का काम आरोपी के खिलाफ सबूत जुटाना और उसे अदालत के समक्ष पेश करने का है। किसी भी नागरिक को कानून हाथ में लेने का हक नहीं है, न ही पुलिस को और न ही वकील को। लेकिन पटियाला हाउस कोर्ट में जेएनयू प्रकरण पर दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में वकीलों के बीच झड़प, पत्रकारों व छात्रों की पिटाई चिंतनीय है, जिसके चलते वकील के दो गुटों के बीच संघर्ष को देखते हुए 'देशद्रोह' के आरोप का सामना कर रहे जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की सुनवाई के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने पटियाला कोर्ट की स्थिति पर दिल्ली पुलिस से जानकारी मांगी, पुलिस के जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर कोर्ट ने कन्हैया मामले की सुनवाई रुकवा कर फौरन छह सदस्यीय वकीलों की टीम को पटियाला कोर्ट मौके पर भेजा। टीम ने अपनी रिपोर्ट में पर्याप्त सुरक्षा नहीं होने की बात कही और इस बीच कन्हैया को कोर्ट ने दो मार्च तक तिहाड़ जेल भेज दिया। इस पूरे प्रकरण में बड़ा सवाल है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को बीच में क्यों आना पड़ा। क्या दिल्ली पुलिस को पता नहीं था कि पटियाला कोर्ट में कितने अहम केस की सुनावाई हो रही है, जबकि उसी ने आरोपी को अरेस्ट कर रिमांड के लिए कोर्ट में पेश किया है। ऐसे में पटियाला कोर्ट परिसर में किसी भी अनहोनी से बचने के लिए पर्याप्त सुरक्षा के इंतजाम की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की ही तो थी। दूसरी बड़ी बात वकीलों का उग्र होना है। जो वकील समस्त अदालती-कानूनी प्रक्रिया की रीढ़ हैं, क्या उन्हें अपने ही न्याय-तंत्र पर भरोसा नहीं है कि वे झड़प करते देखे जा रहे हैं। उन्हें जब कानून की हर बारीकी मालूम है, तो भी वे कानून हाथ में लेते दिख रहे हैं। कन्हैया पर 'देशद्रोह' का आरोप है, आरोप सही है या नहीं, इसकी जांच पुलिस कर रही है और मामले की सुनवाई अदालत कर रही है। अगर वह गुनहगार होगा, निश्चित ही अदालत उसे सजा देगी। हमारी अदालत का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है और कई ऐतिहासिक फैसले देकर उसने लोकतंत्र की रक्षा भी की है और कानून की व्याख्या भी की है। ऐसे में आखिर वकीलों को और कन्हैया के पक्ष में आंदोलन कर रहे छात्रों-शिक्षकों को धैर्य क्यों नहीं है? आज हमारी न्याय व्यवस्था इतना सक्षम है कि वह किसी बेगुनाह को सजा नहीं होने देगी। इस मामले को राजनीतिक रंग देना भी देश हित में नहीं है। देश के शिक्षण संस्थानों में विचारधारा के नाम पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जा सकती है। कांग्रेस और वामदलों को अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। सरकार को भी शांतिपूर्वक इस मसले को निपटाना चाहिए।
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