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चिंतन: संसद को बाधित करना आखिर किसके हित में

जो कांग्रेस यूपीए सरकार के दौर में जीएसटी को लेकर आई थी, वही अब इसका येन केन प्रकारेण विरोध कर रही है।

चिंतन: संसद को बाधित करना आखिर किसके हित में
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रेल और आम बजट पेश होने तक संसद में अपेक्षाकृत शांति रही परन्तु मंगलवार को दोनों ही सदनों में फिर वैसे ही दृश्य देखने को मिले जैसे शीतकालीन सत्र और उससे पहले वाले सत्र में देखे गए थे। हर बात के लिए संसद को बाधित कर हंगामा करना, कार्यवाही को रोकना और उसे स्थगित करने के लिए बाध्य कर देना जैसे एक फैशन बन गया है। संसद देश के समक्ष उत्पन्न अहम मसलों पर सार्थक बहस, चर्चा और वाद-विवाद के लिए है। अतीत में यह इसी के लिए जानी जाती रही है। साठ और सत्तर के दशकों तक भी संसद में सुनने लायक बहस और भाषण होते थे परन्तु पिछले दो-ढाई दशक को देखें तो उत्तरोत्तर लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली संसद को राजनीतिक अखाड़े में तब्दील करके रख दिया गया है। पार्टियों को लगता है कि संसद में हंगामा और नारेबाजी करके इसकी कार्यवाही को बार-बार बाधित कर उसे स्थगित करवाने से उन्हें वोट हासिल होंगे। मूलत: यह सोचही संसदीय व्यवस्था विरोधी है। शांतिपूर्ण तरीके से जो बात कही जा सकती है और जिस पर सार्थक तरीके से बहस हो सकती है, उस पर बेवजह हंगामा करना किसी के भी हित में नहीं है। न संसदीय व्यवस्था के, न लोकतंत्र के, न देश के। संसद के समक्ष ऐसे बहुत से मसले हैं, जिन पर सार्थक बहस की प्रतीक्षा पूरा देश कर रहा है। जीएसटी सहित कई ऐसे विधेयक हैं, जिनके पारित होने का इंतजार बाहर के देश और विदेशी निवेशक भी कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि कम से कम पिछले तीन सत्रों में कार्यवाही को बाधित करने के पीछे एक सोची-समझी रणनीति है ताकि जीएसटी को पारित नहीं किया जा सके। सबसे आश्चर्य का विषय यह है कि जो कांग्रेस यूपीए सरकार के दौर में जीएसटी को लेकर आई थी, वही अब इसका येन केन प्रकारेण विरोध कर रही है। कार्यवाही रोकने के बहाने चाहे जो हों, कांग्रेस और कुछ दूसरे विरोधी दलों की कोशिश यही है कि सदन में शांति बहाल नहीं होने पाए ताकि सरकार को यह अहम बिल रखने और पारित करने का अवसर ही नहीं मिल सके। सरकार कहती आई है कि जीएसटी बिल का पारित होना कितना अहम है। इसके पारित होने से न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा वरन जहां एक तरफ महंगाई पर काबू पाने में मदद मिलेगी वहीं टैक्स सुधारों से व्यापारियों और सरकारों को भी सीधा फायदा पहुंचेगा। इतना ही नहीं, जो विदेशी निवेशक यहां पैसा लगाने के लिए तैयार बैठे हैं, वे भी फौरन भारत का रुख कर सकेंगे परन्तु सत्तारूढ़ दल के नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस यह नहीं चाहती कि भारतीय अर्थव्यवस्था में तीव्र बढ़ोत्तरी का र्शेय किसी भी रूप में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार को मिले। यही वजह है कि कभी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को मुद्दा बनाकर तो कभी राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया के आगरा में कथित आपत्तिजनक बयान को लेकर संसद को बाधित किया जा रहा है। लोकसभा में तो मंगलवार को अन्ना द्रमुक सांसदों ने एक अलग ही मुद्दे पर कार्यवाही को बार-बार बाधित किया। वे अखबारों की प्रतियां लहराकर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के पुत्र कीर्ति के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई की मांग कर रहे थे। जहां तक संसद के समक्ष कामकाज का प्रश्न है, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अभी चर्चा अधूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उस पर जवाब आना है। राज्यसभा में जीएसटी बिल रखा जाना है। कई दूसरे बिल भी आने हैं। इसके अलावा रेल और आम बजट पर चर्चा के बाद उन्हें स्वीकृति मिलनी है। कई दूसरे अहम बिल भी कई सत्रों से लटके हुए हैं। बजट सत्र शुरू होने से पहले समूचे विपक्ष ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए सहयोग का वादा जरूर किया था परन्तु एक बार फिर वे पुराने रास्ते पर ही बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं।

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