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चिंतनः आतंकवाद पर वैश्विक नीति बनाने की जरूरत

सीरिया, इराक, सूडान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया आतंकवाद के मुख्य केंद्र बन गए हैं।

चिंतनः आतंकवाद पर वैश्विक नीति बनाने की जरूरत
पेरिस में बर्बर आतंकी हमले के बाद आतंकवाद पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। खास कर यूरोपीय देशों और अमेरिका को। चूंकि भारत वर्षों से आतंकवाद से पीड़ित रहा है और दुनिया से कहता रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ सभी देशों को एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है, लेकिन यूरोप और अमेरिका हमेशा भारत की पुकार की अनसुनी करते रहे हैं और संगठित आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया अपनाते रहे हैं।
अब जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फ्रांस में अब तक का सबसे बड़ा नरसंहार हुआ है और करीब सवा सौ से अधिक निदरेष लोग मारे गए हैं, जिससे समूचा यूरोप दहशत में है, तो ऐसे में समय आ गया है कि विश्व मजबूती से आतंकवाद के खात्मे का संकल्प ले। पेरिस के इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले इस्लामिक स्टेट (आईएस) यूरोप-अमेरिका की कूटनीतिक गलतियों के चलते ही अब तक का सबसे हिंसक आतंकी संगठन बन गया है। इसके खात्मे के लिए यूरोप और अमेरिका को अपनी विदेश नीति और ग्लोबल आतंकवाद के प्रति सोच में बदलाव करना होगा। जिस तरह इस आतंकी हमले की पूरी दुनिया ने एक स्वर में कड़ी निंदा की है, ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ एक ग्लोबल नीति बनाने का माकूल समय लगता है और जब इस प्रकार की नीति पर चर्चा हो रही होगी तो तटस्थता के साथ आईएस, अलकायदा, तालिबान, बोको हरम, लश्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के पनपने के कारणों पर भी विचार करना होगा। आज यह 'धर्मांध वैचारिक युद्ध' में बदल चुका है।
सीरिया, इराक, सूडान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नाइजीरिया आतंकवाद के मुख्य केंद्र बन गए हैं। यहां सैकड़ों आतंकी संगठन खाद-पानी पा रहे हैं और दुनिया भर में कत्लेआम मचा रहे हैं। इनसे कोई भी देश महफूज नहीं है। जब अमेरिका में 9/11 हुआ, भारत में 26/11 हुआ तभी विश्व बिरादरी को जाग जाना चाहिए, लेकिन अमेरिका केवल अपने को महफूज करने में लग गया। भारत में लगातार आतंकी हमले हुए, ब्रिटेन में हुए, फ्रांस में इससे पहले कई हमले हुए, रूस, ऑस्ट्रेलिया व चीन में भी हमले हुए।
एशिया, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका महादेश के अधिकांश देश कभी न कभी आंतकी हमले के शिकार हुए हैं, लेकिन हर मौके पर चाहे संयुक्त राष्ट्र (यूएन) हो या विकसित-विकासशील शक्तिशाली देश कड़ी निंदा करने से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। हकीकत में एकजुट नहीं हुए, जबकि यूएन, जी-7, जी-20, जी-77 जैसे कई ग्लोबल फोरम हैं, जहां आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल नीति की रूपरेखा तैयार की जा सकती है।
खासकर संयुक्त राष्ट्र सबसे बड़ा मंच है। लेकिन अपने हथियार उद्योग के हितों को ध्यान में रखकर अमेरिका और यूरोप जब तक एशियाई और अफ्रीकी देशों में आशांति बनाए रखने की कूटनीति पर अमल करते रहेंगे, तब तक आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल नीति बनाने की सोच धरातल पर नहीं उतरेगी। यह अच्छा समय है कि जी-20 का शिखर सम्मेलन हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान भी किया है कि आतंकवाद के खिलाफ पूरी मानवता को एकजुट होना होगा। इस मंच से आतंक के खिलाफ ठोस नीति बननी चाहिए।
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