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पाकिस्तान की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी

अलगाववादियों को भारत सरकार कोई पक्ष नहीं मानती है क्योंकि राज्य के वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं।

पाकिस्तान की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी
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पाकिस्तान भारत के साथ प्रस्तावित राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) स्तर की वार्ता के लिए गंभीर नहीं है। वह हर मुमकिन कोशिश कर रहा है कि भारत बातचीत से हाथ खींच ले। बुधवार को उसने नईचाल चली। दरअसल, नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग ने जिस दिन एनएसए स्तर की वार्ताहोनी है उसी दिन कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को बैठक के लिए आमंत्रित किया है। अलगाववादियों को भारत सरकार कोई पक्ष नहीं मानती है क्योंकि राज्य के वे निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं हैं। यही वजह है कि अलगाववादी नेताओं के साथ पाकिस्तान की वार्ता का भारत सरकार विरोध करती है। याद होगा कि भारत ने गत वर्ष अगस्त में उसके इसी हरकत के कारण विदेश सचिव स्तर की बातचीत रद्द कर दी थी। ऐसे में पाकिस्तान की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

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गत महीने रूस के उफा शहर में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच मुलाकात हुई थी, तो उसमें यह तय हुआ था कि दोनों देश टकराव टालने की कोशिश करेंगे, लेकिन पाक लगातार सीजफायर तोड़ रहा है और वहां के नेता भड़काऊ बयान दे रहे हैं। वह इन दिनों लगातार कश्मीर मुद्दे को हवा दे रहा है। वहीं जकीउर रहमान लखवी की आवाज के नमूने देने से वह पहले ही मुकर गया है। यही नहीं आतंकवादी घटनाओं की संख्या भी एका एक बढ़ गई है। घाटी में आए दिन भारतीय सुरक्षा बलों की आतंकियों के साथ मुठभेड़ की खबरें आ रही हैं। अभी पंजाब के गुरदासपुर में आतंकियों ने हमला किया था। जांच में पता चला हैकि वे पाकिस्तान से आए थे। जम्मू कश्मीर के उधमपुर में सुरक्षा बलों के हाथ आया आतंकी मोहम्मद नावेद भी पाकिस्तानी है और लश्कर ए तैयबा से जुड़ा रहा है, यह उसने स्वयं बताया है। इससे स्पष्ट हो गया हैकि पाकिस्तान में तीन शक्तियां काम करती हैं। एक वहां की चुनी हुईसरकार है, दूसरी पाकिस्तानी सेना है और तीसरी वहां की कट्टरपंथी जमातें हैं। पाक की विदेश नीति वहां की सेना ही तय करती है। नवाज शरीफ उसको नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। कट्टरपंथियों पर उसका व्यापक प्रभाव है, उसी के कहने पर वे भारत में आतंक फैलाते हैं। साफ है,भारत को उकसाने वाले ये सारे कारनामे पाक सेना के इशारे पर हो रहे हैं।

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नवाज की सरकार ने भले ही भारत से वार्ता की हामी भर दी हो, लेकिन सेना और कट्टरपंथी नहीं चाहते हैं कि बातचीत हो क्योंकि दोनों देशों के बीच कटु संबंध उन्हें सूट करता है। माना जा रहा हैकि इन्हीं कारणों से पाकिस्तान हरसंभव कोशिश कर रहा है कि भारत पीछे हट जाए। अब भारत में भी कहा जाने लगा हैकि ऐसे में पाकिस्तान की सरकार से बात करने के क्या फायदे होंगे, जब सेना उसे स्वीकार नहीं करेगी और भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देती रहेगी। हालांकि भारत चाहता हैकि आतंकवाद पर उसे वार्ता की मेज पर घेरा जाए। इसके लिए हमारे पास पर्याप्त सबूत भी हैं, लेकिन उधर से जिस तरह की हरकतें हो रही हैं, उसके बाद भारत सरकार पर दबाव बढ़ा है क्योंकि ऐसे में बातचीत के औचित्य पर ही सवाल उठाए जाने लगे हैं?

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