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अपनी कथनी व करनी में एका लाए पाकिस्तान

नवाज शरीफ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वादा किया था कि वे भारत में घुसपैठ पर अंकुश लगाएंगे।

अपनी कथनी व करनी में एका लाए पाकिस्तान
अमेरिका की यात्रा पर गए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने वहां के राष्ट्रपति बराक ओबामा को भरोसा दिलाया है कि उनकी सरकार मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि वे अपनी कथनी-करनी पर कितना खरा उतरते हैं क्योंकि पाकिस्तान के हुक्मरान अक्सर शक्तिशाली देशों के सामने इस तरह का कबूलनामा पेश करते रहे हैं, लेकिन जैसे ही अपने वतन पाकिस्तान पहुंचते हैं, आतंकवाद के प्रति उनके सुर बदल जाते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब उन्होंने रूस के शहर उफा में भारत से किए हुए वादों को सूली पर टांग दिया था। तब नवाज शरीफ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वादा किया था कि वे भारत में घुसपैठ पर अंकुश लगाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि पाक सेना की ओर से संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं नहीं हों। इसके अलावा मुंबई हमले का साजिशकर्ता जकीउर रहमान लखवी की आवाज के नमूने भारत को देने पर भी उन्होंने हामी भरी थी। इसके अलावा दोनों देशों के बीच आतंकवाद के मुद्दे पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता होनी थी, लेकिन पाकिस्तान न सिर्फ एक-एक कर सभी वादों से मुकर गया बल्कि बीच में अनावश्यक रूप से कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए उफा समझौते को भी बेनतीजा साबित कर दिया। और पीछे चलें तो 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ संयुक्त बयान में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि पाकिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने देगा और आतंकवाद को प्र्शय नहीं देगा। आज सच्चाई सबके सामने है। पाकिस्तान आतंकवाद का बहुत बड़ा गढ़ बन गया है। हाफिज सईद जैसे सैकड़ों आतंकी वहां खुलेआम घूमते हैं, संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें आतंकी घोषित कर रखा है, इसके बावजूद वह उन पर कोई कार्रवाई नहीं करता। पाकिस्तान द्वारा लिए जाने वाले इन यू-टर्न से यह बात भी साबित होती है कि उसकी कथनी-करनी में अंतर आरंभ से ही रहा है। दरअसल, पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार का कोई ज्यादा मतलब नहीं रहा है। जानकारों के अनुसार वहां तीन शक्तियां काम करती हैं। पहली, वहां की चुनी हुई सरकार है जिसके मुखिया नवाज शरीफ हैं। दूसरी, सेना है जिसके प्रमुख राहिल शरीफ हैं। पाकिस्तान की विदेश नीति का निर्धारण सेना ही करती है। उसकी र्मजी के बिना नवाज शरीफ एक कदम भी नहीं बढ़ सकते। तीसरी शक्ति वहां की कट्टरपंथी जमातें हैं। वहां की जनता व सेना पर कट्टरपंथियों का प्रभाव है। वे कश्मीर का राग अलापते रहते हैं, जिससे वहां की सेना और चुनी हुई सरकार भी दबाव में आ जाती है। दूसरी ओर पाक सेना नहीं चाहती है कि भारत में आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों पर कोईकार्रवाई हो। जाहिर है, सेना और कट्टरपंथी जमातों के हावी होने से कोई प्रधानमंत्री यदि बदलाव करना भी चाहे तो नहीं कर पाता है। बहरहाल, अब इसका इंतजार रहेगा कि नवाज शरीफ वापस लौटने के बाद क्या भारत में आतंकवाद फैलाने वाले गुटों और उनके सरगनाओं पर कोई कार्रवाई करेंगे या फिर से अपने वादे से मुकर जाएंगे।
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